लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कम नामांकन वाले प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के विलय की नीति के खिलाफ प्रदेशभर के शिक्षक संगठनों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। अब शिक्षकों ने इस नीति को न्यायिक चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली है।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरकार द्वारा जारी यह नीति शिक्षकों के अधिकारों का हनन है और इसका सीधा प्रभाव ग्रामीण बच्चों की शिक्षा पर पड़ेगा। संगठनों का तर्क है कि वे वर्षों से जिस विद्यालय में सेवा दे रहे हैं, वहां की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया है। अब उन विद्यालयों का बंद होना न केवल उनके भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि बच्चों को भी असुविधा का सामना करना पड़ेगा।
मांगें और आपत्तियां:
शिक्षकों की मुख्य मांग है कि—
वर्षों से संचालित विद्यालयों को बंद न किया जाए।
शिक्षकों को जबरन स्थानांतरित न किया जाए।
विद्यालय बंद करने से पूर्व स्थानीय स्थिति, बच्चों की संख्या और सामाजिक प्रभाव का आकलन अनिवार्य रूप से किया जाए।
शिक्षक संगठनों की चेतावनी:
यदि सरकार ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया, तो आंदोलनात्मक रास्ता अपनाने में भी गुरेज नहीं किया जाएगा। संगठनों का कहना है कि विद्यालय विलय की यह नीति ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने वाली है।
अब यह देखना अहम होगा कि हाईकोर्ट में यह मामला क्या रुख लेता है और सरकार इस पर क्या प्रतिक्रिया देती है। फिलहाल शिक्षक संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस नीति को लेकर पीछे हटने वाले नहीं हैं।
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