#तंत्रसोतरहा #जर्जरइमारत #हिंदीकविता #समकालीनकविता #सामाजिकसरोकार #व्यवस्थापरव्यंग्य #प्रशासनिकलापरवाही #संजयएमतराणेकर #कविता #कविलेखकसमीक्षक
जर्जर इमारतें गिरती रहीं, तंत्र सोता रहा,दीवारों की दरारें खूब चीखती रहीं,हमेशा शहर खामोश होता रहा।किसी छत ने पहले ही…