गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)हिंदू धर्म की अनंत परंपराओं में एक अद्भुत प्रसंग वर्णित है—भगवान शंकर द्वारा माता पार्वती को श्रीरामकथा का श्रवण कराना। यह घटना केवल कथा-वाचन नहीं, बल्कि ईश्वर के सगुण और निर्गुण स्वरूप की गूढ़ व्याख्या है।
श्रीरामकथा का दिव्य श्रवण
जब भगवान शिव स्वयं पार्वती जी को श्रीरामकथा का प्रवचन करते हैं, तो यह केवल कथा का पाठ न होकर ईश्वर के स्वरूप की अनुभूति है। माता पार्वती अत्यंत एकाग्रता, भक्ति और श्रद्धा से कथा का रसपान करती हैं। यहाँ एक संकेत छिपा है कि ईश्वर की लीला को समझने के लिए केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, बल्कि गहन श्रद्धा और आत्मसमर्पण आवश्यक है।
ईश्वर: सगुण और निर्गुण का रहस्य
सदियों से यह प्रश्न साधकों और मनीषियों के सामने खड़ा रहा है—क्या ईश्वर सगुण (गुणों से युक्त, रूपवान) है?या वह निर्गुण (गुणातीत, निराकार) है?महान तपस्वी और ऋषि भी इस प्रश्न में उलझ जाते हैं। इसका कारण यह है कि ईश्वर की विराटता असीम और अकल्पनीय है। मानव की बुद्धि, चाहे वह कितनी भी ऊँची क्यों न हो, उस अनंत सत्य को संपूर्ण रूप से पकड़ नहीं सकती।
शास्त्रीय दृष्टि
सगुण स्वरूप: भक्तों के लिए भगवान राम या कृष्ण के रूप में ईश्वर को अनुभव करना। यह भक्ति, प्रेम और आराधना का मार्ग है।निर्गुण स्वरूप: दार्शनिक चिंतन और ध्यान की दृष्टि से ईश्वर को निराकार, निरंजन और सर्वव्यापी मानना। यह ज्ञान और समाधि का मार्ग है।रामकथा में यह द्वैत मिलकर अद्वैत का बोध कराते हैं। भगवान राम लीला पुरुषोत्तम के रूप में सगुण स्वरूप हैं, जबकि उनका अंतर्निहित अस्तित्व निर्गुण ब्रह्म का ही प्रकाश है।
मानव बुद्धि की सीमा
ईश्वर की सत्ता का वर्णन करते हुए शास्त्र कहते है
जैसे नक्षत्र पृथ्वी से असीम दूरी पर हैं, वैसे ही ईश्वर का वास्तविक स्वरूप सांसारिक बुद्धि की पहुँच से परे है।
केवल भक्ति, श्रद्धा और समर्पण ही वह साधन है जिसके द्वारा साधक ईश्वर के स्वरूप का अनुभव कर सकता है।
यह प्रसंग हमें यह शिक्षा देता है कि ईश्वर के स्वरूप को केवल तर्क या बौद्धिकता से नहीं समझा जा सकता। श्रद्धा, भक्ति और विनम्रता ही उसके साक्षात्कार का मार्ग है। भगवान शंकर द्वारा पार्वती जी को श्रीरामकथा का श्रवण इसी तथ्य की ओर संकेत करता है कि जब स्वयं देवाधिदेव शिव कथा सुनाने का कार्य करते हैं, तो साधारण जीव को कितनी श्रद्धा और एकाग्रता से ईश्वर का स्मरण करना चाहिए।
ईश्वर सगुण भी है और निर्गुण भी। वह भक्त की भावना के अनुरूप रूप धारण करता है। इसलिए साधक का मार्ग चाहे भक्ति हो या ज्ञान, अंततः दोनों का लक्ष्य एक ही है—अनंत ब्रह्म से मिलन।
बरहज/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। नगर पालिका परिषद गौरा बरहज में आगामी स्वच्छ सर्वेक्षण 2025–26 की…
गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। शहर में एलपीजी गैस वितरण व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला…
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद पुलिस ने साइबर अपराध के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए…
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। नेपाल में गुरुवार सुबह एक दर्दनाक सड़क हादसा हो गया, जहां…
गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में शुक्रवार सुबह एक सनसनीखेज घटना सामने…
बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद का बेल्थरा रोड रेलवे स्टेशन अब तेजी से आधुनिक स्वरूप…