बलिया(राष्ट्र की परम्परा)
रिमझिम बौछारों से मेरा जलता तन यूं भीग गया।
सावन का महीना मेरे मन में मिश्री घोल गया।।
ठंडी शीतल मंद बयार कानों में क्या कहती है।
जाने किसकी याद में अबकी मन का सावन डोल गया।।
रिमझिम बौछारों से मेरा जलता तन यूं भीग गया।
लहराता आंचल मेरा हवा से बातें करता है।।
मोर पपीहा की बोली सुन मन मेरा जलता है।
बागों में झूले भी पड़ गए अब तो साजन आ जाओ।।
तेरा रास्ता देख देख कर नैनो का काजल बहता है।
रिमझिम बौछारों से मेरा जलता तन यूं भी गया।।
खेतों में हरियाली छाई फसलों में तन्हाई है।
झीनी चदरिया ताने नीले अंबर ने ली अंगड़ाई है।।
क्यों ना समझे बेदर्दी बिरह की आग जलाता है।
अब के बरस के सावन में यह दूरी रास ना आई है।
रिमझिम बौछारों से मेरा जलता तन यूं भीग गया ।।
मेरे हाथों की हरि चूड़ियां खनखन खन खन बजती है।
कब आएंगे गोरी साजन यही वह मुझसे कहती है।।
सारे तीज त्यौहार भी आ गए अब तो साजन आ जाओ।
राह निहारे पलके मेरी हर आहट तेरी लगती है।।
रिमझिम बौछारों से मेरा जलता तन यूं भीग गया।
न सर्दी न गर्मी है बड़ा सुहाना मौसम है।
झूले पर बैठी जब गोरी सावन कजरी गाती है।।
मेहंदी काजल गजरा कंगन करते हैं बेचैन उसे।
रस ना आए उसको सावन जिनके पिया परदेश में हैं।।
रिमझिम बौछारों से मेरा जलता तन यूं भीग गया।
सीमा त्रिपाठी
शिक्षिका साहित्यकार
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