तकनीक की तेज़ रफ़्तार ने जहाँ दुनिया को एक क्लिक पर जोड़ दिया है, वहीं दिलों के बीच दूरी बढ़ा दी है। शहरों की चमक में खोए बच्चे अब वीडियो कॉल पर माँ की मुस्कान ढूंढते हैं, पर वह सुकून नहीं मिल पाता जो कभी रसोई से आती दाल की खुशबू में था। यह कहानी सिर्फ एक घर की नहीं, बल्कि उस पूरे समाज की है जहाँ बुजुर्ग माता-पिता अब अपने ही बच्चों के बीच “ऑफ़लाइन” होते जा रहे हैं।
आज के डिजिटल युग में परिवार साथ तो है, पर दिलों की दूरी ने रिश्तों की गर्माहट ठंडी कर दी है। एक समय था जब शाम होते ही बेटा माँ के पास बैठकर दिन भर की बातें किया करता था, पर अब वह मोबाइल स्क्रीन पर मीटिंग और सोशल मीडिया में उलझा रहता है। माँ के लिए उसकी आवाज़ अब सिर्फ “व्हाट्सएप कॉल” की घंटी में सीमित हो गई है।
बुजुर्ग माता-पिता, जिनके हाथों ने कभी बच्चों को चलना सिखाया, अब उन्हीं हाथों में मोबाइल थमाकर अकेलेपन से लड़ रहे हैं। कई बुजुर्गों का कहना है कि पहले घर में बच्चों की हंसी से आँगन गूंजता था, अब नोटिफिकेशन की आवाज़ ने सब कुछ बदल दिया है।
समाज में यह बदलाव सिर्फ तकनीक की वजह से नहीं, बल्कि हमारे भावनात्मक संतुलन के कमजोर होने की निशानी है। डिजिटल कनेक्टिविटी ने जहाँ दूरी मिटाने का दावा किया, वहीं उसने रिश्तों की गहराई छीन ली।
एक मामला लखनऊ की 70 वर्षीय कमला देवी(काल्पनिक) बताती हैं – “पहले बेटा रोज़ ऑफिस से लौटकर मेरे साथ चाय पीता था। अब कहता है, ‘माँ, ऑनलाइन मीटिंग है।’ उसका चेहरा रोज़ दिखता है, पर वह अब मेरे पास नहीं बैठता।” यह एक माँ का दर्द है, जो आँकड़ों में नहीं, अहसास में दर्ज है।
संदेश
समय की माँग है कि हम तकनीक का उपयोग करें, पर अपने रिश्तों का “अपडेट” भी समय पर करते रहें। मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया जीवन का हिस्सा हैं, पर “माँ-बाप” उसका दिल हैं।
जब तक हम भावनाओं को ऑफलाइन नहीं करेंगे, तब तक परिवार कभी ऑनलाइन नहीं होगा।
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