श्री यदुधाम पीठ: आस्था के आवरण में सत्ता-साधना का नया प्रयोग

गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब में की गई यह घोषणा जितनी ऊँची आवाज़ में समाज, पहचान और आत्मसम्मान की बात करती है, उतनी ही साफ़ तौर पर वह राजनीतिक रणनीति और प्रतीकात्मक राजनीति की ओर संकेत करती है। ‘श्री यदुधाम पीठ’ की स्थापना का ऐलान वस्तुतः धार्मिक-सांस्कृतिक पहल कम और चुनावी गणित से प्रेरित सामाजिक लामबंदी अधिक प्रतीत होता है।
महाराज यदु जैसे पौराणिक-ऐतिहासिक चरित्र को “राजनीतिक प्रतीक बनाकर इस्तेमाल किए जाने” की शिकायत स्वयं में गहरे विरोधाभास से भरी है। जिस व्यक्तित्व को राजनीति से मुक्त कराने का दावा किया जा रहा है, उसी को केंद्र में रखकर एक नई राजनीतिक-सांस्कृतिक धुरी खड़ी की जा रही है। यदि अतीत में यह उपयोग गलत था, तो आज उसी भावनात्मक पूंजी का दोहन किस नैतिक आधार पर सही ठहराया जा सकता है—यह प्रश्न अनुत्तरित है।
“राजनीतिक विचारधाराएं अस्थायी हैं” जैसे वाक्य सुनने में दर्शन प्रतीत होते हैं, लेकिन व्यवहार में यह कथन राजनीति से दूरी नहीं, बल्कि उससे ऊपर खड़े होने का आत्मघोषित भ्रम लगता है। जब स्वयं वक्ता यह स्वीकार करता है कि यह पहल राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं है, तब समाज को किसी एक पार्टी या समूह से जोड़ने की आलोचना खोखली हो जाती है। वास्तव में यह प्रयास समाज को राजनीति से अलग करने का नहीं, बल्कि एक नई वैचारिक छतरी के नीचे संगठित कर सत्ता-संतुलन साधने का संकेत देता है।
“विश्व की पहली श्री यदुधाम पीठ” जैसा दावा तथ्य से अधिक नारेबाजी और भावनात्मक उत्तेजना का उदाहरण है। न इसके वैचारिक ढांचे की स्पष्टता सामने आती है, न यह बताया गया है कि यह पीठ शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुधार या वैचारिक विमर्श में कोई ठोस भूमिका कैसे निभाएगी। प्रतिमाओं की स्थापना और भव्यता के वादे समाज की वास्तविक और जमीनी समस्याओं का विकल्प नहीं हो सकते।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसे “समाज को जोड़ने” की पहल बताया जा रहा है, जबकि इसके राजनीतिक निहितार्थ सामाजिक ध्रुवीकरण को और तीखा करने वाले हैं। पहचान की राजनीति को आध्यात्मिक जामा पहनाकर प्रस्तुत करना न केवल ईमानदार संवाद से बचने की रणनीति है, बल्कि धार्मिक भावनाओं को सत्ता की सीढ़ी बनाने का पुराना और आजमाया हुआ प्रयोग भी है।
यदि ‘श्री यदुधाम पीठ’ का ऐलान सचमुच सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रयास होता, तो उसमें चुनावी संकेतों, राजनीतिक स्वीकारोक्तियों और भावनात्मक नारों की इतनी प्रबल मौजूदगी नहीं होती। अपने वर्तमान स्वरूप में यह पहल सामाजिक चेतना का आंदोलन नहीं, बल्कि सत्ता-समीकरण साधने की सुनियोजित कवायद अधिक प्रतीत होती है।

rkpNavneet Mishra

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