नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)भारत की विदेश नीति सदियों से “वसुधैव कुटुंबकम” — संपूर्ण विश्व एक परिवार है — के सिद्धांत पर आधारित रही है। यही कारण है कि भारत किसी भी संघर्ष या युद्ध में पक्ष नहीं लेता, बल्कि शांति, स्थिरता और संवाद का सेतु बनता है। बीते महीनों में भारत की यह कूटनीतिक पहचान और सशक्त हुई है — चाहे अफगान तालिबान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी की भारत यात्रा रही हो, रूस-यूक्रेन युद्ध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शांति पहल या जी-20 सम्मेलन में भारत की निर्णायक भूमिका — हर मंच पर भारत की डिप्लोमैटिक साख बढ़ी है।
अब मिस्र का गाज़ा पीस समिट (Gaza Peace Summit) भारत के लिए एक और वैश्विक मंच बनने जा रहा है। यह सम्मेलन मिस्र के शर्म-अल-शेख में आयोजित हो रहा है, जिसकी अध्यक्षता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी कर रहे हैं। इस उच्चस्तरीय शिखर बैठक में शांति योजना के पहले चरण को अंतिम रूप दिया जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही व्यक्तिगत रूप से इसमें शामिल नहीं होंगे, लेकिन भारत की उपस्थिति विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह के माध्यम से दर्ज होगी। यह भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें स्पेन, जापान, पाकिस्तान, अज़रबैजान, हंगरी, साइप्रस, ग्रीस, बहरीन जैसे 20 देशों के नेता हिस्सा लेंगे।
इस सम्मेलन का उद्देश्य इज़राइल और हमास के बीच हुए युद्धविराम को स्थायी शांति योजना में बदलना है। सूत्रों के अनुसार, हमास 20 इज़राइली बंधकों को रिहा करेगा, वहीं इज़राइल 1900 से अधिक फ़िलिस्तीनी कैदियों को मुक्त करेगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प सोमवार को तेल अवीव पहुंचे, जहां उनका विमान ‘एयर फोर्स वन’ सुबह 9:42 पर बेन गुरियन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा। इस दौरान ‘होस्टेजेज स्क्वायर’ पर हजारों लोग एकत्रित थे, जिन्होंने रिहा किए गए बंधकों का स्वागत किया। ट्रम्प का यह दौरा उस शांति प्रक्रिया की शुरुआत का प्रतीक माना जा रहा है, जिसमें भारत की “संतुलित कूटनीति” फिर एक बार वैश्विक विमर्श का केंद्र बनेगी।
भारत के लिए यह अवसर है कि वह विश्व के सामने एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में अपनी छवि को और सशक्त करे — जो न युद्ध का समर्थन करता है, न चुप रहता है; बल्कि संवाद, संयम और समाधान का मार्ग दिखाता है।
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