अंबर से धरती तक तीनों लोकों में,
चमक रहे सूर्यदेव उनको प्रणाम है।
जगत प्रकाशित जिनसे होता है,
भुवन भास्कर तुमको प्रणाम है।
सनातन धर्म में सूर्य व प्रकृति को
ईश्वर का ही रूप माना जाता है,
इसी परंपरा में सूर्य को साक्षात्
ईश्वर मान कर पूजा जाता है।
सूर्य साधना, उपासना शारीरिक,
मानसिक और सांसारिक दु:खों,
से मुक्ति देने वाली मानी जाती है,
जो रोगों से छुटकारा दिलाती है।
हिन्दू धार्मिक मान्यताओं में सूर्य
चार मूर्ति रूपों में मंगल करते हैं,
सूर्यदेव की चार मूर्तियों के गुण
और शक्तियों का वर्णन करते हैं।
प्रथम मूर्ति राजसी मूर्ति कहलाती है,
संसार की रचना करने वाली भी है,
सूर्य देव की यह मूर्ति ब्राह्मी शक्ति
के रूप में भी जानी मानी जाती है।
विष्णु रूप सूर्यदेव की दूसरी मूर्ति है,
यह सत्व, सौम्य गुणों वाली होती है,
यह मूर्ति बुराई और दुर्जनों का अंत
कर जगत का पालन करने वाली है।
सूर्य की तीसरी मूर्ति को शंकर
भगवान के रूप में पूजी जाती है,
जो उग्र या तामसी गुणों वाली है,
जो संहार शक्ति स्वरूप वाली है।
सूर्य की चौथी मूर्ति मूर्ति होने
पर भी अदृश्य रूप में रहती है,
प्रणव मूर्ति नजर नहीं आती है,
यह ॐ शक्ति स्वरूप होती है।
आदित्य दिखाई देने वाली साकार
निराकार सबमें यह शक्ति स्थित है,
इसे अति श्रेष्ठ मूर्ति माना जाता है,
यह संसार इससे ही आगे बढ़ता है।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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