राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख: ग्रामोदय से राष्ट्रोदय के अद्भुत साधक

नवनीत मिश्र

राष्ट्र की चेतना को जगाने वाले महामानवों में एक नाम हैl भारत रत्न नानाजी देशमुख। वे ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने अपने जीवन को न पद के लिए जिया, न प्रचार के लिए, बल्कि समाज के पुनर्निर्माण और आत्मनिर्भर भारत की नींव रखने के लिए समर्पित किया। 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के हिंगोली में जन्मे नानाजी बाल्यकाल से ही अनुशासित, कर्मठ और जिज्ञासु थे। जीवन में अभावों के बावजूद उन्होंने कभी संघर्ष से मुंह नहीं मोड़ा। आरएसएस से जुड़कर उन्होंने राष्ट्रसेवा का व्रत लिया और आजीवन उसी मार्ग पर अडिग रहे।
नानाजी देशमुख भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में अग्रणी रहे। उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में संगठन और वैचारिक नेतृत्व का नया अध्याय जोड़ा। 1967 में विपक्षी एकता के सूत्रधार बनकर उन्होंने लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी। लेकिन सत्ता उनके लक्ष्य में नहीं थी। उन्होंने राजनीति से सन्यास लेकर ग्रामोदय की दिशा में कदम बढ़ाया। उनका स्पष्ट विश्वास था कि समाज यदि सशक्त है, तो सत्ता अपने आप संवेदनशील हो जाती है।
राजनीति से दूर होकर नानाजी देशमुख ने चित्रकूट को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में चुना। यहां उन्होंने दीनदयाल शोध संस्थान (Deendayal Research Institute) की स्थापना की। उनका लक्ष्य था, गांवों को आत्मनिर्भर, स्वावलंबी और संस्कारित बनाना। उन्होंने कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और पर्यावरण संरक्षण को ग्राम विकास के पाँच आधार स्तंभ बनाए। चित्रकूट का यह मॉडल आज भी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि बिना सरकारी अनुदान के भी समाज स्वयं अपने बल पर विकास कर सकता है।
नानाजी का मानना था कि भारत का वास्तविक चेहरा गांवों में बसता है। जब गांवों का उत्थान होगा, तभी राष्ट्र सशक्त बनेगा। उनकी “ग्रामोदय” अवधारणा आज के “आत्मनिर्भर भारत” अभियान की वैचारिक नींव है। उन्होंने गांवों में शिक्षा को जीवन कौशल से जोड़ा, कृषि को नवाचार से, और समाज को संस्कार से। उनकी कार्यशैली ने यह दिखाया कि सेवा, साधना और स्वावलंबन से ही विकास टिकाऊ हो सकता है।
नानाजी देशमुख का पूरा जीवन एक सुसंगठित अनुशासन का प्रतीक था। उन्होंने कभी निजी लाभ की कामना नहीं की। उनका हर कार्य समाज के उत्थान के लिए था। उनकी वाणी में सरलता और विचारों में गहराई थी। वे कहा करते थेl “सेवा का अर्थ दान नहीं, बल्कि आत्मबल से समाज को सशक्त बनाना है।” उनकी सोच और कर्म की एकता ने उन्हें “राष्ट्रऋषि” की उपाधि दिलाई।
2019 में भारत सरकार ने नानाजी देशमुख को भारत रत्न से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल उनके योगदान का नहीं, बल्कि उस विचारधारा का सम्मान था जो “अंत्योदय” समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने की भावना पर आधारित है।
आज जब देश ग्राम विकास, स्वावलंबन और समावेशी प्रगति की दिशा में आगे बढ़ रहा है, नानाजी का मॉडल पहले से अधिक प्रासंगिक है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा विकास वही है जो समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चले, राजनीति का उद्देश्य सेवा होना चाहिए, सत्ता नहीं, और राष्ट्रनिर्माण का मूल केन्द्र व्यक्ति नहीं, समाज है।
नानाजी देशमुख ने दिखाया कि बिना किसी पद या प्रतिष्ठा के भी व्यक्ति समाज को दिशा दे सकता है। उनकी जयन्ती पर उन्हें स्मरण करना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प है।

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Editor CP pandey

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