जल बचाने की मुहिम में जनभागीदारी जरूरी

भारत में जल संकट अब केवल भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की गंभीर चुनौती बन चुका है। देश के अनेक हिस्सों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। तालाब, कुएं और परंपरागत जलस्रोत सूख रहे हैं तथा खेती और पेयजल की जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में जल संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। सरकार योजनाएं बना सकती है, संसाधन उपलब्ध करा सकती है और दिशा निर्धारित कर सकती है, लेकिन पानी की हर बूंद बचाने के लिए समाज की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।
इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए ‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान जल संरक्षण को सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़ाकर जन-अभियान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। 6 सितंबर 2024 को शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य बारिश के पानी को संरक्षित करना, भूजल स्तर को बढ़ाना तथा स्थानीय जलस्रोतों को मजबूत बनाना है। इसके तहत कम लागत में जल संरक्षण की संरचनाएं तैयार करने, पुराने और बंद पड़े नलकूपों को उपयोगी बनाने तथा स्थानीय जरूरतों के अनुसार जल संरक्षण के उपाय अपनाने पर जोर दिया जा रहा है।
इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी जनभागीदारी की अवधारणा है। इसमें सरकार के साथ आम नागरिक, ग्राम पंचायतें, सामाजिक संगठन और कंपनियां भी अपनी भूमिका निभा सकती हैं। अभियान का आधार तीन ‘सी’—कम्युनिटी, कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी और कॉस्ट—अर्थात समुदाय, कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी और लागत को केंद्र में रखता है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है कि जल संरक्षण केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी न रहे, बल्कि प्रत्येक नागरिक इसे अपना सामाजिक दायित्व समझे।
देश में इस दिशा में बड़े पैमाने पर काम भी हुआ है। अभियान के पहले चरण में मई 2025 तक 27 लाख से अधिक जल संरक्षण संरचनाएं बनाई गईं। इसके बाद जून 2025 में दूसरे चरण की शुरुआत हुई। मई 2026 तक डेढ़ करोड़ से अधिक भूजल पुनर्भरण संरचनाएं बनाए जाने की जानकारी सामने आई और 3 सितंबर 2026 तक यह संख्या एक करोड़ 58 लाख से अधिक हो गई। निश्चित रूप से ये आंकड़े जल संरक्षण को लेकर देश में बढ़ती सक्रियता को दर्शाते हैं।
हालांकि केवल जल संरक्षण की संरचनाएं बना देना पर्याप्त नहीं है। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे सही स्थान पर बनाई गई हैं या नहीं, बारिश का पानी वास्तव में उनमें पहुंच रहा है या नहीं और उनका नियमित रखरखाव हो रहा है या नहीं। यदि जल संरचनाएं कुछ वर्षों बाद मिट्टी, गाद और कचरे से भर जाएं तो उनका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। इसलिए स्थानीय समुदायों को इनके निर्माण के साथ-साथ रखरखाव और निगरानी की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी।
भारत की जल संरक्षण परंपरा बहुत समृद्ध रही है। गांवों में तालाब, कुएं, बावड़ियां, जोहड़ और छोटे बांध सदियों तक लोगों की पानी संबंधी जरूरतों को पूरा करते रहे हैं। हरियाणा, राजस्थान और देश के अन्य हिस्सों में आज भी अनेक पारंपरिक जल संरचनाएं हमारी पुरानी जल प्रबंधन व्यवस्था की याद दिलाती हैं। आधुनिक विकास के दौर में हमने इन परंपरागत स्रोतों की उपेक्षा की और भूजल का अनियंत्रित दोहन बढ़ता गया। आज आवश्यकता इस बात की है कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ जोड़कर जल प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था विकसित की जाए।
इसी उद्देश्य से जल संचय जन भागीदारी को ‘जल शक्ति अभियान—वर्षा जल संचयन’ से भी जोड़ा गया है। जून 2026 में इसे नए स्वरूप में आगे बढ़ाते हुए वर्षा जल के संरक्षण और भूजल पुनर्भरण पर विशेष जोर दिया गया। इसका मूल संदेश बेहद सरल है—बारिश की अधिक से अधिक बूंदों को बहकर नालियों में जाने से रोकना और उन्हें धरती के भीतर पहुंचाना।
जल संकट का एक महत्वपूर्ण कारण कृषि क्षेत्र में पानी का अत्यधिक इस्तेमाल भी है। देश के कई हिस्सों में ऐसी फसलों की खेती की जाती है जिनमें अपेक्षाकृत अधिक पानी की आवश्यकता होती है। लगातार भूजल निकालने से जमीन के भीतर पानी का स्तर तेजी से गिर रहा है। ऐसे में फसल विविधता, बूंद-बूंद सिंचाई, फुहार सिंचाई और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। किसानों को जल बचत वाली तकनीकों और फसल पद्धतियों के लिए प्रोत्साहित करना जल सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
ग्राम पंचायतें जल संरक्षण की सबसे मजबूत इकाई बन सकती हैं। प्रत्येक गांव अपना ‘जल बजट’ तैयार कर सकता है। इसमें वर्षभर में गांव में आने वाले पानी, घरेलू और कृषि उपयोग में खर्च होने वाले पानी तथा जमीन में वापस पहुंचाए जा सकने वाले पानी का आकलन किया जा सकता है। इससे गांव के लोगों को अपने क्षेत्र की वास्तविक जल स्थिति समझने और उसके अनुरूप योजना बनाने में मदद मिलेगी।
विद्यालयों और महाविद्यालयों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बच्चों को केवल पाठ्यपुस्तकों में जल संरक्षण पढ़ाने के बजाय विद्यालय परिसरों में वर्षाजल संचयन, पौधारोपण और पानी की बचत की व्यवहारिक व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। बच्चे जब जल संरक्षण की आदत सीखेंगे तो उसका संदेश परिवार और समाज तक भी पहुंचेगा।
1 और 2 सितंबर 2026 को आयोजित जल शक्ति मंत्रालय के विभागीय सम्मेलन में केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल, जल जागरूकता, प्रशिक्षण, राज्यों के बीच अनुभव साझा करने तथा जल संबंधी विश्वसनीय आंकड़े तैयार करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया। यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की जल समस्याएं अलग हैं। कहीं बाढ़ की समस्या है तो कहीं सूखे की। इसलिए हर क्षेत्र के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल प्रबंधन की रणनीति बनानी होगी।
जल संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि व्यवहार में बदलाव है। नल को अनावश्यक रूप से खुला छोड़ना, बारिश के पानी को नालियों में बह जाने देना, तालाबों और जलस्रोतों पर अतिक्रमण करना तथा जरूरत से अधिक भूजल निकालना रोकना होगा। हमें पानी को असीमित संसाधन मानने की मानसिकता बदलनी होगी।
‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान की वास्तविक सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी संरचनाएं बनाई गईं। इसकी सफलता तब होगी जब सूखे तालाबों में पानी लौटे, भूजल स्तर सुधरे, किसानों की सिंचाई संबंधी चुनौतियां कम हों और आम नागरिक पानी बचाने को अपनी जिम्मेदारी समझे।
भारत की जल सुरक्षा केवल सरकारी योजनाओं से सुनिश्चित नहीं हो सकती। सरकार दिशा, नीति और संसाधन उपलब्ध करा सकती है, लेकिन जल संरक्षण को जन-आंदोलन बनाने की जिम्मेदारी समाज की है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर पानी की एक-एक बूंद बचाने का संकल्प ले, प्रत्येक गांव अपने जलस्रोतों की रक्षा करे और प्रत्येक संस्था जल संरक्षण को अपनी प्राथमिकता बनाए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षित किया जा सकता है।
जल है तो जीवन है और जल बचाना केवल पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने का संकल्प है।

लेखिका: डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक

Editor CP pandey

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