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छठ घाट पर “पोस्टर पूजा” जब भक्ति और राजनीति ने साथ लिया डुबकी

छठ पर्व भारतीय जनमानस की सबसे पवित्र, अनुशासित और सादगीपूर्ण उपासना। यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सूर्य के प्रति श्रद्धा, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और परिवार के प्रति निष्ठा का पर्व है। परंतु इस वर्ष की छठ पूजा के दृश्य देखकर यही प्रश्न उठता है कि क्या हमारी भक्ति अब भी निष्कलंक रही है, या वह भी राजनीति की परछाई में रंग चुकी है?
इस बार घाटों पर सूरज देव से पहले प्रत्याशी देवता को अर्घ्य चढ़ाया जा रहा है। पूजा की थालियों से ज्यादा चमक अब बैनर और पोस्टरों की है। कहीं लिखा है। “चौथी विनाश के लिए हमें चुनो”, तो कहीं । “दलालों से साठगांठ चाहिए तो हमें वोट दो।” अब लगता है कि मतपत्र की सुगंध भी अब घाटों तक पहुँच चुकी है। भागलपुर से लेकर देवरिया तक, हर घाट पर चुनावी माहौल का उत्सव चल रहा है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे चुनाव आयोग ने घाटों को नॉमिनेशन सेंटर घोषित कर दिया हो।
फल, फूल, प्रसाद और दूध की जगह अब बैनर, झंडे और प्रचार सामग्री ने ले ली है। कुछ प्रत्याशी तो नाव पर DJ के साथ “उग जा सूरज देव” की जगह “वोट दे तू मेरे नाम का” बजाते हुए प्रचार यात्रा निकाल रहे हैं। वहीं, दूसरे प्रत्याशी ऐसी शोभायात्रा कर रहे हैं कि जनता भ्रमित हो जाए कि यह कोई बारात है या चुनावी रैली। फर्क बस इतना कि वहां दूल्हा प्रत्याशी है और बाराती आम जनता।
स्थानीय लोगों का कहना है कि घाटों पर अब “भक्ति” नहीं, “बाहुबलीता” का मुकाबला दिख रहा है। “जिसका पोस्टर बड़ा, वही नेता पक्का” नया नारा बन गया है। गरीब प्रत्याशियों के पोस्टर तो टिकने भी नहीं दिए जाते। जगहें अब “रिज़र्व” हो गई हैं। साठगांठ और रसूखदार उम्मीदवारों के नाम पर। छठ की पवित्रता के बीच यह राजनीतिक प्रदूषण हमारी सामाजिक चेतना के लिए एक गंभीर संकेत है।
व्रतियों के सिर पर जहां गन्ना और दूध होना चाहिए, वहां अब प्रत्याशियों की तस्वीरें लटक रही हैं। घाटों की शांति अब शोरगुल में बदल गई है। भक्ति का मौन भाव अब माइक की गर्जना में दब गया है। यह दृश्य न सिर्फ हमारी आस्था का उपहास है, बल्कि यह उस लोकसंस्कृति की भी हत्या है जो सादगी और समर्पण पर टिकी थी।
फिर भी, इस विडंबना में एक व्यंग्यात्मक सच्चाई छिपी है। “लोकतंत्र की जागरूकता अब घाट तक पहुँच गई है।” जनता अब हर मंच पर राजनीति को पहचानने लगी है, चाहे वह संसद हो या पूजा स्थल। परंतु डर यही है कि जिस दिन छठ घाट पर सूरज देव के बगल में वोटिंग बूथ लग गया, उस दिन आस्था और राजनीति का फर्क सदा के लिए मिट जाएगा।
छठ पर्व हमें निस्वार्थ भाव, संयम और शुद्धता सिखाता है। यह पर्व हमें जोड़ता है न कि बांटता। इसलिए आवश्यकता है कि इस पवित्र उत्सव को राजनीतिक प्रदूषण से मुक्त रखा जाए। भक्ति को प्रचार से, श्रद्धा को स्वार्थ से और आस्था को आकर्षण से अलग रखा जाए। तभी घाटों पर फिर वही दिव्यता लौट सकेगी। जहां सूर्य की किरणों में सच्ची आस्था झलके, न कि पोस्टरों की चकाचौंध।

प्रदीप कुशवाहा -(भागलपुर)

Karan Pandey

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