जयंती पर विशेष: पुनीत मिश्र
“जिस हवा में फूल अपने पूरे सौन्दर्य के साथ नहीं खिल सकता, वह हवा अवश्य दूषित हवा है। जिस समाज में मनुष्य अपने व्यक्तित्व का पूरा विकास नहीं कर सकता, वह समाज भी अवश्य दूषित समाज है।”
नई कहानी आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर मोहन राकेश का यह कथन केवल एक सुंदर रूपक नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के अंतर्विरोधों पर की गई तीखी टिप्पणी है। यह पंक्ति हमें उस अदृश्य प्रदूषण की ओर ले जाती है, जो हवा में नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं, मानसिकताओं और मूल्यों में फैला होता है।
नयी कहानी आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में मोहन राकेश ने साहित्य को आदर्शों के कृत्रिम आवरण से मुक्त कर जीवन की वास्तविकताओं के सामने खड़ा किया। उनकी दृष्टि में मनुष्य कोई अमूर्त नैतिक इकाई नहीं, बल्कि इच्छाओं, कुंठाओं, असुरक्षाओं और आत्मसंघर्षों से भरा जीवित व्यक्ति है। इसलिए उनका साहित्य न तो उपदेश देता है और न ही पलायन का रास्ता सुझाता है, बल्कि समाज के भीतर जमी उन परतों को उघाड़ता है, जो व्यक्ति के स्वाभाविक विकास को रोकती हैं।
मोहन राकेश का समाजबोध विशेष रूप से मध्यवर्गीय जीवन के इर्द-गिर्द घूमता है। वह वर्ग जो बाहर से सभ्य, संस्कारित और सुरक्षित दिखता है, लेकिन भीतर से भय, समझौते और दमन से ग्रस्त है। उनकी कहानियों और नाटकों में पात्र अक्सर ऐसे मोड़ पर खड़े दिखाई देते हैं, जहाँ वे स्वयं से प्रश्न करते हैं। क्या मैं वही हूँ, जो मुझे होना चाहिए था? यह आत्मसंघर्ष दरअसल उस दूषित सामाजिक हवा का परिणाम है, जिसमें व्यक्ति अपनी पूरी संभावनाओं के साथ साँस नहीं ले पाता।
उनका नाटक आषाढ़ का एक दिन हो या आधे-अधूरे, हर जगह व्यक्ति और समाज के बीच का तनाव केंद्रीय रूप में उभरता है। रचनात्मक स्वतंत्रता, प्रेम, महत्वाकांक्षा और जिम्मेदारी। इन सबके बीच फँसा मनुष्य मोहन राकेश के यहाँ नायक नहीं, बल्कि प्रश्नचिह्न बन जाता है। यही प्रश्नचिह्न पाठक को बेचैन करता है और सोचने पर मजबूर करता है कि कहीं यह कहानी हमारी अपनी तो नहीं।
मोहन राकेश का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने सामाजिक दूषितता को शोर-शराबे या नारेबाजी से नहीं, बल्कि संवेदनशील चुप्पियों और अधूरे संवादों से रेखांकित किया। उनके पात्र जो नहीं कह पाते, वही सबसे अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है। यह मौन दरअसल उस दबे हुए व्यक्तित्व की आवाज़ है, जिसे समाज सुनना नहीं चाहता।
आज के समय में, जब व्यक्ति की पहचान उपभोग, प्रतिस्पर्धा और दिखावे से तय की जा रही है, मोहन राकेश की चेतावनी और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यदि समाज ऐसी हवा बन जाए, जिसमें विचार, संवेदना और आत्मस्वीकृति के फूल खिल ही न सकें, तो प्रगति के तमाम दावे खोखले सिद्ध होते हैं।
मोहन राकेश हमें यह याद दिलाते हैं कि किसी भी समाज की वास्तविक शुद्धता उसकी इमारतों, नियमों या घोषणाओं से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह अपने मनुष्यों को कितना खुला आकाश देता है। जहाँ व्यक्ति अपने पूरे सौन्दर्य, अपने विचार, अपने स्वप्न और अपनी असहमति के साथ- खिल सके, वही समाज वास्तव में स्वच्छ और जीवंत कहलाने योग्य है।
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