नवनीत मिश्र
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में गणेशशंकर विद्यार्थी का नाम एक ऐसे जुझारू सेनानी के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अपनी कलम से अंग्रेजी हुकूमत की नींव को चुनौती दी और समाज को जागरूक करने का कार्य किया। उनकी पुण्यतिथि हमें न केवल उनके संघर्ष और बलिदान की याद दिलाती है, बल्कि यह भी सोचने को प्रेरित करती है कि आज के दौर में उनके आदर्श कितने प्रासंगिक हैं।
पंडित गणेशशंकर विद्यार्थी जी ने पत्रकारिता को जनसेवा का माध्यम बनाया। ‘प्रताप’ समाचार पत्र के जरिए उन्होंने निर्भीक होकर अन्याय, शोषण और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई। वे सत्ता के दबाव से कभी नहीं डरे और हमेशा सच के साथ खड़े रहे। उनके लेखों में समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा साफ झलकती थी, जो उन्हें आम जनता का सच्चा प्रतिनिधि बनाती थी।
उनका व्यक्तित्व अत्यंत सरल, किंतु विचारों में दृढ़ता से भरा हुआ था। वे धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे, लेकिन उनका धर्म मानवता पर आधारित था। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, भेदभाव और सांप्रदायिकता के खिलाफ लगातार संघर्ष किया और समाज में एकता व सौहार्द का संदेश दिया।
कानपुर में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान उनका अद्वितीय साहस देखने को मिला। वे दंगों के बीच फंसे लोगों को बचाने के लिए आगे आए और इसी प्रयास में अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका यह बलिदान आज भी मानवता और भाईचारे की सबसे बड़ी मिसाल के रूप में याद किया जाता है।
आज जब पत्रकारिता की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, तब पंडित गणेशशंकर विद्यार्थी जी का जीवन एक आदर्श की तरह सामने आता है। उनकी निर्भीकता, ईमानदारी और जनपक्षधरता आज भी पत्रकारों के लिए प्रेरणा स्रोत है।
उनकी पुण्यतिथि पर जरूरत है कि हम केवल उन्हें याद ही न करें, बल्कि उनके विचारों और मूल्यों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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