बौद्ध दर्शन और संस्कृति को जोड़ता पालि साहित्य

अद्वितीय है भारतीय ज्ञान परंपरा में पालि साहित्य का योगदान, गोरखपुर विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने और उसे वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत करने में पालि साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी उद्देश्य को केंद्र में रखते हुए दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में पालि साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग तथा उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुई, जिसमें देशभर के विद्वानों, शिक्षकों और शोधार्थियों ने सहभागिता की।
उद्घाटन सत्र: पालि साहित्य भारतीय बौद्धिक विरासत की आधारशिला
संगोष्ठी के उद्घाटन एवं प्रथम सत्र का संचालन डॉ कुलदीपक शुक्ल ने किया। कार्यक्रम की संरक्षिका और कुलपति प्रो पूनम टंडन ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में पालि साहित्य का योगदान अद्वितीय है। यह साहित्य न केवल बौद्ध दर्शन को समझने का माध्यम है, बल्कि नैतिकता, करुणा और सामाजिक समरसता का भी सशक्त आधार प्रस्तुत करता है। उन्होंने भविष्य में अन्य विश्वविद्यालयों के साथ अकादमिक सहयोग बढ़ाने और पालि साहित्य के शोध को सुदृढ़ करने पर बल दिया।

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विभागाध्यक्ष डॉ कीर्ति पाण्डेय ने स्वागत भाषण में कहा कि पालि साहित्य दर्शन, नैतिक चिंतन और समाज सुधार की परंपरा को जीवंत रखता है। मुख्य वक्ता प्रो रामनक्षत्र प्रसाद (पूर्व कुलपति, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय) ने पालि साहित्य के दार्शनिक, साहित्यिक और व्यावहारिक पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला। धन्यवाद ज्ञापन डॉ देवेंद्र पाल ने किया।
द्वितीय सत्र: पुरातत्व, संस्कृति और पालि ग्रंथ
द्वितीय चर्चा सत्र का संचालन डॉ देवेंद्र पाल ने किया। मुख्य वक्ता प्रो सुजाता गौतम (काशी हिंदू विश्वविद्यालय) ने पालि साहित्य और भारतीय संस्कृति के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने अष्टांगिक मार्ग की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि पालि साहित्य भारतीय समाज को नैतिक दिशा प्रदान करता है। इस अवसर पर कई वरिष्ठ विद्वान और शोधकर्ता मंचासीन रहे, जिससे सत्र अकादमिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा।
तृतीय सत्र: शांति, सहअस्तित्व और समरसता का संदेश
अंतिम सत्र का संचालन स्मिता द्विवेदी ने किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ अरुणा शुक्ला (लखनऊ विश्वविद्यालय) ने कहा कि पालि साहित्य आज के समय में शांति और सहअस्तित्व का मार्ग प्रशस्त करता है। मुख्य वक्ता डॉ यशवंत राठौर (निदेशक, बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर) ने पुरातत्व और पालि साहित्य के आपसी संबंधों पर प्रकाश डालते हुए ‘मिलिंदपन्हो’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का उल्लेख किया।

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शोध प्रस्तुतियां और राष्ट्रीय सहभागिता
संगोष्ठी के दौरान विश्वविद्यालय के लगभग 20 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। साथ ही एक समानांतर ऑनलाइन सत्र में बिहार, दिल्ली, उत्तराखंड, जम्मू, लेह-लद्दाख और असम सहित विभिन्न राज्यों के विद्वानों ने भाग लिया। कुल मिलाकर 35 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत हुए, जिससे यह आयोजन पालि साहित्य राष्ट्रीय संगोष्ठी के रूप में यादगार बन गया।
समापन अवसर पर कार्यक्रम संयोजक डॉ कुलदीपक शुक्ल ने सभी प्रतिभागियों और सहयोगी संस्थानों के प्रति आभार व्यक्त किया।

Editor CP pandey

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