जीव को शिव से जोड़ने वाला ही सच्चा महावीर : भामिनी शरण जी महाराज

बलिया(राष्ट्र की परम्परा) अद्वैत शिवशक्ति परमधाम पीठ, दूहा बिहरा में चल रहे भागवती कथा के दौरान व्यासपीठ से प्रवचन करते हुए पूज्य संत अतुल कृष्ण भामिनी शरण जी महाराज ने कहा कि यथार्थ महावीर वही है जो जीव को शिव से मिला दे। उन्होंने कहा, “महावीर वह नहीं जो केवल शारीरिक या बौद्धिक बल से लड़ाई करे, बल्कि वह है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ दे। जैसे कि महाबली हनुमान ने सुग्रीव और विभीषण को प्रभु श्रीराम से मिलाकर उनकी जीवनदिशा बदल दी।”

उन्होंने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती, उन्हें केवल शरणागति प्रिय है। इसलिए जब विभीषण शरण में आया, तो भगवान ने उसे लंकेश बना दिया। यहां तक कि यदि रावण भी शरण में आ जाता, तो वे उसे अवधेश बना देते।

मातृशक्ति की महिमा पर बल
भामिनी शरण जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में माँ की भूमिका सर्वोपरि रही है। सुमित्रा को मातृत्व का उच्चतम स्थान मिला क्योंकि उन्होंने लक्ष्मण जैसे आदर्श भक्त को जन्म दिया। वहीं कौशल्या और कैकेयी को यह गौरव प्राप्त नहीं हुआ। पुत्रवती वही युवती कहलाती है जिसका पुत्र प्रभु-भक्त हो।

उन्होंने कहा कि संसार की सबसे कोमल वस्तु कमल है, उससे भी कोमल कमला हैं जो कमल पर विराजती हैं। परंतु उससे भी कोमल हैं उनके करकमल, जो प्रभु के चरणों को दबाते हैं। माता जानकी के वनगमन और उनके कांटों से भरे मार्ग की कल्पना करते हुए उन्होंने कहा कि लक्ष्मण और हनुमान जैसे सेवक क्या अनुभव करते होंगे, यह विचारणीय है।

समाज निर्माण में माँ का योगदान
उन्होंने कहा कि समाज निर्माण में सबसे अहम भूमिका माताओं की होती है। मदालसा, सुमित्रा, सुनीति, सावित्री जैसी महान माताएं भारत के स्वर्णिम इतिहास की गौरवशाली प्रतीक हैं। एक शिशु के स्वभाव का मूल निर्माण उसकी माँ करती है।

सच्ची भक्ति और समर्पण की आवश्यकता
प्रवचन में यह भी कहा गया कि जब माता, पिता, गुरु, स्वामी और सखा – सभी कुछ प्रभु ही हैं, तो उनकी सेवा प्राणपण से क्यों न की जाए? उन्होंने कहा, “प्रभु कृपालु हैं, वे विनम्र को ऊँचा उठा देते हैं और अहंकारी को तृणवत बना देते हैं।” उन्होंने महाभारत की चर्चा करते हुए कहा कि पांडवों की विजय का रहस्य उनकी शरणागति ही थी।

उन्होंने कहा, “भक्ति मार्ग में एक कदम बढ़ाइए, गुरु उससे दस कदम आगे बढ़ाएंगे। झूठमूठ की भक्ति दिखावटी हो सकती है, लेकिन सच्ची भक्ति कोई विरला ही करता है। बनावटी साधु बनना आसान है, किंतु यथार्थ साधु होना कठिन है।”

अंत में उन्होंने श्रोताओं को आत्मपरीक्षण की प्रेरणा देते हुए कहा कि “हमें यह देखना चाहिए कि हम कहीं भेड़चाल में तो नहीं चल रहे? यदि शिष्य भाव से चलें, तो सच्चे गुरु अवश्य मिलेंगे। हां, इसके लिए हमें लोकेषणा, वित्तेषणा और पुत्रेषणा जैसे मोहों से बचना होगा।

Editor CP pandey

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