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दीपावली पर विशेषः-कुत्सित मानसिकता का परित्याग कर समाज में स्वच्छ और समरस वातावरण का करें सृजन

✍ नवनीत मिश्र
      भारत वर्ष पर्वो का देश है। यहाॅ व्रत, पर्व एवं उत्सवों की एक लम्बी श्रृंखला है। जो सनातन संस्कृति और परम्पराओं को जीवन्त बनाये रखने में सहायक है। प्रत्येक व्रत-पर्व के साथ कोई न कोई कथा- कहानी जुड़ी होती है। जो परिचायक है हमारी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों की। इसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में हम प्रत्येक वर्ष कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या को दीप पर्व दीपावली हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाते है ।

      दीपोत्सव का हिन्दू समाज में विशिष्ट स्थान है।अमावस्या के स्याह अंधेरे को छाँटने का यह पर्व हमारे मन को आन्नदित करने के साथ ही साथ दुःख व दरिद्रता को मिटाकर सुख समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है कहते है कि भगवान श्रीराम चैदह वर्ष के वनवास के बाद रावण का संहार करके जब अयोध्या लौटे तो उनके आगमन से प्रसन्न अयोध्यावासियों ने सम्मान में दीप जलाकर भगवान श्रीराम का स्वागत किया। तभी से यह पर्व प्रतिवर्ष हर्ष-उल्लास के साथ धूम-धाम से मनाया जाता हैं।
      एक अन्य कथा के अनुसार भगवान श्रीविष्णु ने इसी दिन राजा बलि की कैद से सभी देवी-देवताओं को देवी लक्ष्मी सहित मुक्त कर दिया था। बलि की कैद से मुक्त होने के बाद देवी लक्ष्मी ने सभी को पुनः धन-धान्य से समृद्ध व सभी सुखों से परिपूर्ण कर दिया था। इसीलिए आज के दिन लक्ष्मी पूजन भी किया जाता है। दीपावली के दिन घरों -की सफाई-पुताई करा, सजाकर स्वच्छ वातावरण का सृजन किया और महालक्ष्मी के साथ श्रीगणेश और देवी सरस्वती का भी पूजन अर्चन विधि विधान से किया जाता है । श्री लक्ष्मी जी के साथ गणपति भगवान और माॅ सरस्वती की पूजा करने का तात्पर्य है कि विना ज्ञान और बुद्धि के धन की प्राप्ति सम्भव नही है। कारण देवी सरस्वती ज्ञान और भगवान गणेश बुद्धि के दाता है । इसीलिए दीपावली के दिन देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती और श्री गणेश भगवान के पूजन-अर्चन की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है।
      अतः इस पावन पर्व पर हम सभी का कर्तव्य है कि जिस प्रकार हम घरों की सफाई-पुताई करते करते है, उसी प्रकार अपने मन मस्तिष्क की सफाई करके कुत्सित मानसिकता का परित्याग करके समाज में स्वच्छ और समरस वातावरण का सृजन करें। यही इस ज्योति पर्व का सन्देश है।

rkpnews@somnath

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