यूं ही कोई जेटली नहीं बन जाता

भारतीय राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल पद से नहीं, बल्कि प्रभाव से होती है। अरुण जेटली ऐसे ही नेता थे। राजनीति, कानून और नीति निर्माण, तीनों क्षेत्रों में समान अधिकार रखने वाले जेटली को अनौपचारिक रूप से “पढ़े-लिखे विद्वान मंत्री” के रूप में देखा जाता था। वे भारतीय जनता पार्टी के लिए केवल एक वरिष्ठ नेता नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में समाधान निकालने वाले संकटमोचक भी थे।
सौम्य स्वभाव, संतुलित भाषा और स्पष्ट दृष्टि उनकी राजनीतिक पहचान थी। वे बिना शोर-शराबे के बड़े निर्णयों को दिशा देने वाले नेता थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी और सरकार के लिए वे सेतु की भूमिका निभाते रहे। चाहे संगठन के भीतर समन्वय हो या विपक्ष के साथ संवाद, जेटली हर मोर्चे पर संतुलन साधने में सक्षम थे। स्वास्थ्य कारणों से उनका सक्रिय राजनीतिक जीवन समय से पहले थम गया, लेकिन उनका योगदान भारतीय राजनीति में लंबे समय तक स्मरणीय रहेगा।
जेटली की सबसे बड़ी शक्ति उनका संवाद कौशल था। कानून की शिक्षा ने उन्हें तार्किक सोच दी, वहीं सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव ने उनकी बातों में विश्वसनीयता पैदा की। इसी वजह से उन्होंने कानून, वाणिज्य और वित्त जैसे जटिल मंत्रालयों को कुशलता से संभाला। वस्तु एवं सेवा कर जैसे ऐतिहासिक सुधार उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धि रहे, जिसने देश की कर प्रणाली को नई दिशा दी।
राजनीतिक रणनीति के स्तर पर भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। “मोदी है तो मुमकिन है” जैसे प्रभावी नारे की परिकल्पना और रणनीति में उनकी भूमिका मानी जाती है। बिहार में भाजपा के विस्तार और जदयू जैसे दलों के साथ समन्वय बनाने में भी जेटली की अहम भूमिका रही। वे विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए भी मध्यम मार्ग के समर्थक थे। यही कारण था कि विभिन्न दलों के नेताओं के साथ उनका संवाद बना रहता था। संसद में वे जितने प्रखर थे, व्यक्तिगत रिश्तों में उतने ही सहज और उदार।
वाजपेयी काल से लेकर मोदी काल तक के दौर में भाजपा को संघर्ष और सत्ता दोनों का अनुभव हुआ। संघर्ष के वर्षों में जेटली जैसे नेताओं की राजनीतिक सूझबूझ ने कार्यकर्ताओं में विश्वास बनाए रखा। वे मानते थे कि राजनीति केवल टकराव नहीं, बल्कि धैर्य, संवाद और निरंतरता का अभ्यास है।
राजनीति के साथ-साथ उनका कानूनी जीवन भी उतना ही सशक्त रहा। 1977 में वकालत की शुरुआत कर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट सहित देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में अपनी पहचान बनाई। 1990 में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामांकन, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की जिम्मेदारी और कई चर्चित मामलों में सहभागिता उनकी विधिक क्षमता का प्रमाण रही। कानून और समसामयिक विषयों पर उनके लेख आज भी गंभीर विमर्श के संदर्भ माने जाते हैं।
अरुण जेटली का जीवन इस बात का उदाहरण है कि विचार, संवाद और संतुलन के जरिए राजनीति को गरिमा दी जा सकती है। वे भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन राजनीति में विवेक, संयम और संवाद की जो परंपरा उन्होंने स्थापित की, वह आने वाली पीढ़ियों को दिशा देती रहेगी।

rkpNavneet Mishra

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