हर जनवरी में नई तारीखें, वही पुराने धोखे

फोकस:नया साल, पुरानी व्यवस्थाटैग:संपादकीय नया साल व्यवस्था धोखे राजनीति समाज आत्ममंथन

साल बदला है, सच नहीं। दीवार पर नया कैलेंडर टंग गया है, तारीखें चमक रही हैं, पर देश-समाज की तस्वीर वही धुंधली है। हर जनवरी हमें यह भ्रम देती है कि कुछ नया शुरू होगा, कुछ बदलेगा, मगर कुछ ही दिनों में यह भ्रम टूट जाता है। तारीखें आगे बढ़ जाती हैं, पर सच्चाई अपनी जगह जमी रहती है।
हर साल सत्ता नए वादों के साथ आती है। विकास, पारदर्शिता, सुशासन शब्द बदलते हैं, स्क्रिप्ट वही रहती है। योजनाएँ घोषणाओं में जन्म लेती हैं और फाइलों में दम तोड़ देती हैं। जनता से हर साल ‘सब्र’ माँगा जाता है, मगर सब्र की सीमा कब पार हो गई, इसका हिसाब कोई नहीं देता। बेरोज़गारी आंकड़ों में छिपा दी जाती है, महंगाई को हालात का नाम देकर टाल दिया जाता है और असफलताओं पर चुप्पी ओढ़ ली जाती है।
साल दर साल व्यवस्था अपनी नाकामियों को नए पैकेज में परोसती है। पुराने वादों पर नया कवर चढ़ा दिया जाता है। सवाल पूछने वालों को हतोत्साहित किया जाता है और असहमति को अव्यवस्था बताकर किनारे कर दिया जाता है। जनवरी आते ही भाषणों में उम्मीद जगाई जाती है, और दिसंबर आते-आते वही उम्मीदें थकी हुई नज़र आती हैं।
समाज भी इस धोखे में बराबर का साझेदार बन चुका है। हम हर नए साल पर नैतिकता, सहिष्णुता और एकता की बातें करते हैं, लेकिन व्यवहार में नफ़रत और स्वार्थ को बढ़ावा देते हैं। हम बदलाव चाहते हैं, पर जिम्मेदारी से बचते हैं। गलती ‘सिस्टम’ की बताते हैं, जबकि चुप्पी हमारी अपनी होती है।
मीडिया से लेकर मंचों तक, हर जगह नया साल ‘उत्सव’ बनकर आता है। सवालों की जगह जश्न ले लेता है। समीक्षा की जगह सेलिब्रेशन परोसा जाता है। जाते हुए साल की विफलताओं पर गंभीर बहस के बजाय, आने वाले साल की खोखली उम्मीदें बेच दी जाती हैं।
फिर भी, पूरी तस्वीर अंधेरी नहीं है। इसी समाज में कुछ लोग हर साल वही तारीखें नहीं दोहराते, वे वही धोखे स्वीकार नहीं करते। वे चुपचाप व्यवस्था से सवाल करते हैं, ईमानदारी निभाते हैं और बदलाव की ज़िद पकड़े रहते हैं। असली नया साल उन्हीं के भीतर शुरू होता है।
सवाल सिर्फ़ इतना है कि क्या यह जनवरी भी सिर्फ़ तारीखें बदलेगी, या हम धोखों से हिसाब माँगने का साहस करेंगे? अगर जवाब दूसरा नहीं है, तो मान लेना चाहिए कि अगली जनवरी में भी हम यही लिखेंगे, हर जनवरी में नई तारीखें, वही पुराने धोखे।
हर साल की यही कहानी है, कैलेंडर नया है और कील पुरानी है…
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!
rkpNavneet Mishra

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