हाँ घर एक मंदिर होता है,
बड़े बुजुर्ग सब ये कहते हैं,
घर की बुनियादें गहरी होती,
पर दीवारें तो ऊँची होती हैं।
हो वास्तु परक द्वार आँगन,
दीवारों पर रोशन रंग रोगन,
आग्नेय कोण में बने रसोई,
ईशान कोण में प्रभु पूजन।
मुख्य शयन कक्ष की जगह,
नैऋत्य, या वायव्य कोण हों,
घर में सुख शांति आती जब,
इसी तरह सब शयन कक्ष हों।
शयन कक्ष का अति महत्व,
है शयन की वास्तु दृष्टि से,
उत्तर या पाश्चात्य दिशा में,
पैर रखें निद्रा आएगी सुख से।
वास्तु परक निर्माण किया तो,
घर में सुख शांति, समृद्धि बढ़े,
अंदर-बाहर है शुचिता बढ़ती,
प्रभू-कृपा और यशकीर्ति बढ़े।
गृह निर्माण का सर्वोच्च मन्त्र,
हैं रच गये वास्तु के निर्माता,
गृह का स्वामी समझदार हो,
सुंदर मकान है तब बनता।
गृह लक्ष्मी समझदार हो तो,
घर लक्ष्मी निवास बन जाता,
पति-पत्नी की समझ मिले तो,
घर पावन मन्दिर बन जाता।
घर की सन्तानें होनहार हों तो,
घर स्वर्ग सदृश बन जाता है,
घर के बुजुर्ग बाबा दादी हों तो,
धरती पर स्वर्ग उतर आता है।
ऐसा कहना है बड़े बुजुर्गों का,
यही मान्यता इस देश की है ।
जिस देश में नदियाँ माँ सम हों,
प्रस्तर प्रतिमा में प्रभु स्थित हों।
सबसे न्यारा सब जग से प्यारा,
प्यारा भारत का हर एक निवासी,
आदित्य निछावर है जीवन,“जननी
जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिग़रीयसी।”
कर्नल आदि शंकर मिश्र, आदित्य
लखनऊ
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