साहित्य करता है, राजनीतिक सत्ता का विरोध :डॉ रणविजय

काव्यकृति ‘कस्तूरी’ का विमोचन एवं साहित्यिक परिचर्चा कार्यक्रम

भाटपार रानी/ देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)

भाटपार रानी डॉ० आमोद कुमार राय ‘पंकज’ संयुक्त आचार्य, अंग्रेजी विभाग, दीनदयाल उपाध्याय, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर की काव्यकृति ‘कस्तूरी’ का विमोचन एवं साहित्यिक परिचर्चा का आयोजन गुरुवार को कस्बे के मदन मोहन मालवीय स्नातकोत्तर महा विद्यालय के सभागार में किया गया।
कार्यक्रम के बतौर मुख्य अतिथि डॉ० रणविजय सिंह सुप्रसिद्ध व्यंगकार एवं पूर्व मुख्य वाणिज्यिक प्रबंधक पूर्वोत्तर रेलवे, गोरखपुर ने संबोधित करते हुए कहा कि साहित्य को बर्दाश्त करने की क्षमता सत्ता में होनी चाहिए। क्योंकि साहित्य राजनीतिक सत्ता का विरोध करती है। साहित्य में एक अच्छे समाज एवं व्यक्ति निर्माण की क्षमता है।
श्री सिंह ने कहा कि साहित्य एवं राजनीति के एक दूसरे के प्रतिकूल है। साहित्य अपनी सृजनशीलता के आधार पर राजनीति को आईना दिखाती है,उसे शिखर पर पहुंचने के लिए प्रेरित करती है ।प्रबंधक एवं प्राचार्य के संबंधों पर व्यंग करते हुए उन्होंने कहा कि यहां प्राचार्य और प्रबंधक के संबंध साहित्य और राजनीतिक संबंध जैसा संबंध नहीं है। इन दोनों लोगों के संबंध में सृजनात्मक भाव है ,जिससे प्रदेश की पूर्वी छोर पर स्थित यह महाविद्यालय दोनों ही प्रांत के युवाओं को गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा से जोड़ने का कार्य कर रहा है है। इन दोनों लोगों के आपसी संबंध से महाविद्यालय का चौमुखी विकास हो रहा है।
विशिष्ट अतिथि प्रो0 अनिल कुमार राय, पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग, दी०, द०, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर ने कहा कि कहा कि ‘कस्तूरी ‘रचना के माध्यम से अमोद कुमार राय ने हिंदी साहित्य एवं संस्कृति की सदस्यता ग्रहण कर ली है। सभागार ने इसकी वैधानिक मान्यता भी प्रदान कर दी है। सत्य को प्रतिष्ठित करने के लिए युक्तियां दी जाती है, इस पुस्तक में इस तथ्य को ढूंढने का प्रयास किया गया है। किसान ,मजदूर विद्यार्थी कोई भी साहित्यिक दृष्टि को प्राप्त कर सकता है। सृजन के उपकरण अलग से नहीं आते समाज ही ऐसा उपकरण प्रदान करता है। आज राष्ट्र निर्माण के केंद्र में राजनीति को प्रतिष्ठित कर दिया गया है ,जो चिंताजनक है। साहित्य एवं राजनीति के अंतर्संबंधों पर उन्होंने विस्तार पूर्वक चर्चा की और कहा कि एक काया को प्रतिष्ठित करता है तो दूसरा आत्मा को राजनीति एवं साहित्य की परस्पर संगम से राष्ट्र निर्माण की आधारशिला रखी जा सकती है। यथार्थवाद ,राष्ट्रवाद की सभी पक्षों पर उन्होंने विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला ।
अध्यक्षता कर रहे प्रो. रामदरश राय सेवानिवृत्त आचार्य, हिंदी विभाग, दी०, द0, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर ने अपने उद्बोधन में कहा कि अंग्रेजी का आचार्य काव्यकृति ‘कस्तूरी’ की रचना करता है,यह सराहनीय कदम है ।कबीर काव्य में कस्तूरी आत्मा व परमात्मा की सम्बंन्धों की ओर संकेत करता हैं, भटकाव से मुक्ति की राह दिखाता है, तो यह काव्य ग्रंथ वैश्विक मंच पर भटके हुए लोगों को यथार्थ दृष्टि प्रदान करेगा। संस्थान के प्रबंधक व वरिष्ठ भाजपा नेता राघवेंद्र वीर विक्रम सिंह ने कहा कि महाविद्यालय परिवार के लिए यह गौरव का क्षण है। इस संस्थान का निकला हुआ दीपक आज संपूर्ण पूर्वांचल को अपनी ज्योति से प्रकाशित कर रहा है। यह कस्तूरी काव्य संपूर्ण राष्ट्र में ही नहीं ,अपितु राष्ट्र के बाहर भी अपनी भारतीय पहचान को रेखांकित करने का कार्य करेगा।
आचार्य अमोद कुमार राय ने कहा कि व्यंग्य की विधा इतनी आसान नहीं होती है ,इस विधा में सामने बैठे हुए व्यक्ति की समालोचना की जाती है और वह नाराज भी नहीं होता है। उन्होंने तीन बिंदुओं पर गंभीरता से प्रकाश डाला और कहा की कविता व्यक्ति के चातुर्दिक विकास का मार्ग है।
प्राचार्य प्रोफेसर सतीश चंद्र गौड़ ने महाविद्यालय के तरफ अतिथियों के प्रति आभार प्रकट किया। समारोह का सफल संचालन साहित्यकार एवं समारोह के आयोजक डॉ पवन कुमार राय ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र के सामने दीप प्रज्वलित कर माल्यार्पण के साथ किया गया।
कार्यक्रम में प्रोफेसर कमलेश नारायण मिश्र, प्रोफेसर मनोज कुमार, प्रोफेसर सुधीर कुमार शुक्ल, शिवप्रसाद, प्रवीण शाही ,आदि लोगों ने प्रतिभाग लिया।
rkpnews@desk

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