किसी अनन्य मित्र ने सुझाव भेजा है,
ओमिक्रान के बढ़ने के साथ साथ ही
दुनिया में सर्दी का प्रकोप बढ़ रहा है,
केवल भाप नहीं हाफ़ भी ज़रूरी है।
वैसे उन्होंने हास्य रूप में कहा होगा,
मेरा मानना है फिर भी हाफ़ बुरा नहीं,
हाफ़ और भी ले लो भाइयो ज़रूरी है
यदि, मुझे तो इसकी ज़रूरत नहीं।
यह भी कहा कि नये साल की ख़ुशी
में ज़्यादा मचलने की ज़रूरत नहीं,
मात्र वर्ष बदला है, जोड़ीदार, काम
और लक्ष्य सारे अभी भी बदले नहीं।
इसलिए मैं मानता हूँ सुख दुःख जो
भी वो दे रहा है उसे अपना बना लो,
सुख में बस उसका धन्यवाद, उससे
ही दुःख निवारण की अर्ज़ कर लो।
जिस चीज़ को उसने दिया जिस
हाल में उसने दिया स्वीकार कर लो,
जीवन में उसकी मर्ज़ी ही चलने दो,
उसकी मर्ज़ी बिना कुछ मत कर लो।
ज़िन्दगी प्रयोजन है, जिसमें रिश्ते
नाते लक्ष्य बन जाते हैं, बचपन तो
उत्साह है, युवावस्था प्रतिबद्धता है,
लेकिन वृद्धावस्था अभिसप्तता है।
सन्तान प्रोत्साहन है, मित्रता वेतन है,
तो पुरानी मित्रता पेंशन बन जाती है,
जीवन की यह सारी परिस्थितियाँ
आदित्य ईश्वर की देन मानी जाती हैं।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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