नवनीत मिश्र
हर वर्ष 2 अक्टूबर को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाती है। यह दिन महात्मा गांधी की जयंती के साथ जुड़ा है और हमें यह स्मरण कराता है कि हिंसा कभी स्थायी समाधान नहीं दे सकती। शांति, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलकर ही मानवता का वास्तविक उत्थान संभव है।
अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं है। यह हमारे विचारों, शब्दों और कर्मों में करुणा और संयम की अभिव्यक्ति है। जब हम किसी को आहत न करें, जब हम अपने शब्दों से किसी को चोट न पहुँचाएँ, जब हम प्रकृति और जीव-जंतु के साथ संवेदनशीलता से व्यवहार करें—तभी अहिंसा का सच्चा रूप सामने आता है।
गांधीजी का जीवन इस सिद्धांत का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने दिखाया कि सत्य और अहिंसा केवल नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि राजनीतिक परिवर्तन के सशक्त साधन भी हो सकते हैं। स्वतंत्रता संग्राम में उनका यही हथियार अंग्रेज़ी हुकूमत को झुकाने में कारगर साबित हुआ। गांधी ने कहा था— “अहिंसा कमजोर का हथियार नहीं, बल्कि सबसे बड़े साहसी का संबल है।”
21वीं सदी में हिंसा का स्वरूप बदल गया है। कभी यह युद्ध के रूप में दिखाई देती है, तो कभी आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, जातीय संघर्ष और घरेलू हिंसा के रूप में। तकनीकी युग में तो शब्दों की हिंसा भी उतनी ही घातक हो गई है—चाहे वह सोशल मीडिया पर नफरत भरी भाषा हो या डिजिटल मंचों पर असहिष्णु टिप्पणियाँ।
ऐसे समय में गांधी की अहिंसा और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह केवल संघर्ष से बचने का उपाय नहीं, बल्कि मतभेदों को संवाद में बदलने का रास्ता है।
युवा पीढ़ी को समझना होगा कि दुनिया को बदलने के लिए हिंसा नहीं, बल्कि रचनात्मक ऊर्जा और सकारात्मक सोच की आवश्यकता है। यदि युवा अपनी ऊर्जा को शिक्षा, नवाचार और सामाजिक सद्भाव में लगाएँ, तो न केवल उनका व्यक्तिगत जीवन बेहतर होगा, बल्कि समाज और राष्ट्र भी मजबूत होंगे।
अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक चेतावनी और संदेश है। चेतावनी इस बात की कि हिंसा का मार्ग अंततः विनाश की ओर ही ले जाता है, और संदेश इस बात का कि करुणा, सत्य और अहिंसा से ही स्थायी शांति की नींव रखी जा सकती है।
यदि हम अपने भीतर थोड़ी-सी संवेदना और धैर्य पैदा कर लें, तो यह संसार संघर्ष का नहीं, बल्कि सहअस्तित्व और सहयोग का घर बन सकता है।
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