भारत की आस्था प्रत्यक्ष अनुभूति पर आधारित: मोहन भागवत

इंदौर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को इंदौर के ब्रिलिएंट कन्वेंशन सेंटर में आयोजित एक समारोह में केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल की पुस्तक ‘परिक्रमा कृपासार’ का विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने भारत की आस्था, परंपरा और समाज में एकता के महत्व पर अपने विचार रखे।

भागवत ने कहा कि भारत की आस्था किसी कल्पना पर आधारित नहीं है, बल्कि यह प्रत्यक्ष अनुभूति पर टिकी हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जैसे विज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण की मांग करता है, वैसे ही भारतीय आस्था के लिए भी प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद हैं, जिन्हें प्रयास और प्रयोगों के जरिए अनुभव किया जा सकता है।

उन्होंने भारत के गौरवशाली अतीत का उल्लेख करते हुए कहा, “हमारे पूर्वजों की पवित्रता की चेतना और भावना के कारण भारत 3000 वर्षों तक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश रहा। उस समय तकनीकी प्रगति उच्च स्तर पर थी, लेकिन पर्यावरण का कोई क्षरण नहीं हुआ। मानव जीवन सुखी और सुसंस्कृत था।”

आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि भारत ने हमेशा दुनिया को सभ्यता, ज्ञान और शास्त्रों की शिक्षा दी, लेकिन कभी किसी देश पर विजय प्राप्त करने, व्यापार को दबाने या धर्मांतरण करने का प्रयास नहीं किया।

विश्व में हो रहे संघर्षों पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि लोग अक्सर इस बात पर टकराते हैं कि भगवान एक हैं या अनेक, लेकिन हमारे दार्शनिकों ने यह स्पष्ट किया है कि “सिर्फ भगवान हैं, और कोई नहीं।”

उन्होंने समाज में समानता और सद्भाव की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि दुनिया में टकराव तब होता है जब एक व्यक्ति खुद को दूसरे से श्रेष्ठ समझता है। “हम मानते हैं कि हम सब एक हैं, लेकिन क्या हम सबके साथ एकता का व्यवहार करते हैं? नहीं। इसलिए समाज में वास्तविक एकता स्थापित करनी होगी,” उन्होंने कहा।

👉 यह कार्यक्रम बड़ी संख्या में विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आरएसएस स्वयंसेवकों की मौजूदगी में संपन्न हुआ।

Editor CP pandey

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