मेरा मन क्यों भटकता जा रहा है,
किसी अंजान भय से तड़प रहा है,
मन के अंदर क्या कुछ हो रहा है,
भीतर ही भीतर कुछ खटक रहा है।
जीवन के अतीत से उलझन क्यों है,
बीती यादों से ये बिदकन क्यों है,
बिदकन है उनसे तो अटकन क्यों है,
उन यादों से हो रही जलन क्यों है।
कल की तुलना अब आज से क्यों है,
बीती बातों की अब धड़कन क्यों है,
उन लमहों में किसी ने क्या कहा था,
उनकी यादों में आज तड़प क्यों है।
मन में लालच का नशा भटका रहा है,
लालच बुरी बला, कलंक लग रहा है,
करनी ऐसी हो कि कलंक न लग पाये,
इतिहास के पन्नो में मन उलझ रहा है।
प्रयास हमें बहुत कुछ सिखा देता है,
प्रयास पर अध्ययन और मनन हो,
जिसकी निरंतरता के लिए अवश्य,
निरंतर ही अध्ययन में प्रयासरत हो।
अच्छे के साथ सभी अच्छे बन जाते हैं,
बुरे के साथ भलाई वाले कम होते हैं,
हीरे से ही हीरा तराशा जा सकता है,
कीचड़ में कमल भी खिल सकता है।
किसी का बुरा करे ये कर्म उसका है,
पर जो बुरा करे उसके साथ अच्छा
करने वाला आदित्य महान होता है,
उसके साथ तो स्वयं ईश्वर होता है।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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