मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी…: रानी लक्ष्मीबाई

मनु से रानी लक्ष्मीबाई तक की अदम्य साहस की अमर गाथा प्रस्तुत कर रहे हैं पुनीत मिश्र

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई वीरांगनाओं ने अपने साहस, नेतृत्व और अदम्य इच्छाशक्ति से देशवासियों को प्रेरित किया, परंतु इन सबमें झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, जिन्हें बचपन में “मनु” कहा जाता था—का स्थान सर्वोपरि है। उनकी जयंती केवल एक तिथि नहीं, बल्कि स्त्री-शक्ति, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के संकल्प का उज्ज्वल प्रतीक है।
19 नवंबर 1828 को वाराणसी में जन्मी मनु (मणिकर्णिका) बचपन से ही तेजस्वी, निर्भीक और अत्यंत कुशल थीं। उन्होंने तलवारबाज़ी, घुड़सवारी और शस्त्र चलाने की शिक्षा उसी सहजता से ग्रहण की, जैसे अन्य बच्चे खेल-कूद सीखते हैं। मनु का उदात्त स्वभाव और तेज बुद्धि आगे चलकर उन्हें असाधारण नेतृत्व प्रदान करने वाली बनी।
झाँसी के महाराजा गंगाधर राव से विवाह के बाद मनु “लक्ष्मीबाई” बनीं। अल्प आयु में ही उन पर राज्य की जिम्मेदारियाँ आ गईं, परंतु उन्होंने हर चुनौती का सामना अदम्य साहस से किया। दत्तक पुत्र दामोदर राव के उत्तराधिकार को नकारने वाले अंग्रेजों के डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स ने संघर्ष की चिंगारी को ज्वाला बना दिया।
1857 का स्वतंत्रता संग्राम जब पूरे देश में फैला, तब झाँसी में उसकी आत्मा स्वयं रानी लक्ष्मीबाई थीं। अंग्रेज़ी हुकूमत ने जब झाँसी को हड़पने की कोशिश की, तब रानी ने दृढ़ स्वर में कहा,
“मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी…”
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि गुलामी के विरुद्ध समूचे देश का संकल्प बन गया।
रानी हर मोर्चे पर स्वयं नेतृत्व करती थींl रणभूमि में वे तलवारों की जोड़ी से जिस कौशल से लड़ती थीं, वह आज भी अद्भुत उदाहरण है। उनके नेतृत्व में झाँसी ने अंग्रेज़ों के खिलाफ ऐसा प्रतिरोध दिखाया, जिसकी मिसाल कम ही मिलती है।
ग्वालियर के पास 1858 में लड़ते हुए लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुईं। किंतु वे पराजित नहीं हुईंl क्योंकि पराजय उन लोगों की होती है जिनका लक्ष्य व्यक्तिगत हो। रानी का ध्येय राष्ट्र की स्वतंत्रता था, और उसी उद्देश्य के लिए उन्होंने प्राण न्योछावर कर दिए।
उनकी शहादत ने स्वतंत्रता आंदोलन में नई ऊर्जा, नया विश्वास और अदम्य प्रेरणा भर दी। आज भी भारतीयों के हृदय में रानी लक्ष्मीबाई साहस, स्वाभिमान और अटूट देशप्रेम की प्रतीक बनकर जीवित हैं।
रानी लक्ष्मीबाई का जीवन हमें सिखाता है कि संघर्ष चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, यदि मन में दृढ़ संकल्प और सत्य का साथ हो, तो कोई भी शक्ति हमें रोक नहीं सकती। उनकी गाथा हर बेटी को यह विश्वास देती है कि वह केवल परिवार या समाज ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के नेतृत्व में भी अग्रणी हो सकती है।
मनु की जयंती पर हम उनकी अदम्य वीरता को नमन करते हैं।

rkpNavneet Mishra

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