रायपुर, छत्तीसगढ़ (राष्ट्र की परम्परा)
राज्य विद्युत नियामक आयोग द्वारा बिजली की दरों में की गई भारी वृद्धि ने प्रदेश की आम जनता को गहरा झटका दिया है। यह वृद्धि जुलाई माह से लागू हो चुकी है और अगस्त के बिजली बिलों में इसका सीधा असर दिखेगा, विशेष रूप से उन गरीब और निम्न आय वर्ग के उपभोक्ताओं पर जो सीमित खपत पर निर्भर हैं।
बिजली दरों में की गई यह वृद्धि, 523.43 करोड़ रुपये अतिरिक्त वसूली का रास्ता साफ करती है, जिसमें से करीब 330 करोड़ रुपये केवल घरेलू उपभोक्ताओं से वसूले जाएंगे। घरेलू उपभोक्ताओं के लिए औसतन 15 पैसे प्रति यूनिट का भार बढ़ाया गया है, लेकिन इसमें भी सबसे अधिक असर 100 यूनिट तक खपत करने वाले गरीब उपभोक्ताओं पर पड़ा है, जिनसे 20 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्त वसूले जा रहे हैं। वहीं ज्यादा खपत करने वालों से केवल 10 पैसे प्रति यूनिट ही वसूले जा रहे हैं, जिससे स्पष्ट है कि ऊंचे आय वर्ग को न केवल राहत, बल्कि बिना विवेक के खपत को प्रोत्साहन भी मिल रहा है।
उद्योगपतियों यानी उच्च दाब उपभोक्ताओं से मात्र 193 करोड़ रुपए की अतिरिक्त वसूली की जा रही है, और इन पर दरों में वृद्धि सिर्फ 10 पैसे प्रति यूनिट की गई है। राज्य सरकार का यह दावा कि उद्योगों पर औसतन 25 पैसे का भार डाला गया है, सरासर भ्रामक प्रतीत होता है।
कृषि क्षेत्र के लिए 50 पैसे प्रति यूनिट की दर से वृद्धि की गई है, जिससे किसानों की उत्पादन लागत में और इजाफा होगा। पहले से ही डीएपी की कमी और कालाबाजारी से जूझ रहे किसान अब बिजली के मोर्चे पर भी बोझ से दबते जा रहे हैं। सरकार द्वारा यह दावा कि किसानों पर कोई अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा क्योंकि यह राशि सब्सिडी से अदा की जाएगी – वास्तव में आम जनता से वसूले गए करों के माध्यम से भार को पुनः उन्हीं पर थोपना है।
इस पूरी दर वृद्धि की संरचना यह दर्शाती है कि सरकार क्रॉस सब्सिडी की अवधारणा से पीछे हट रही है – जिसमें अमीर वर्ग से अधिक शुल्क लेकर गरीब वर्ग को सस्ती सेवा दी जाती थी। अब इस संरचना को उलटते हुए गरीबों पर ज़्यादा बोझ और अमीरों को ज़्यादा राहत दी जा रही है।
राज्य सरकार की स्मार्ट मीटर और प्री-पेड बिलिंग प्रणाली की योजना को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। कई विशेषज्ञ इसे बिजली व्यवस्था के निजीकरण की दिशा में एक कदम मान रहे हैं, जिससे आगे चलकर बिजली और महंगी तथा गरीबों के लिए और भी मुश्किल हो सकती है।
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