हरियाणा में टोल की मार सबसे ऊँची वसूली, सबसे कम दूरी, व्यवस्था पर ठोस सवाल

जब गुजरात जैसा बड़े आकार वाला प्रदेश पीछे रह जाए और छोटा हरियाणा टोल वसूली में सबसे आगे हो—तो यह महज संयोग नहीं, नीतिगत असंतुलन का संकेत है
लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में वह सच सामने आया जिसे हरियाणा के लोग वर्षों से महसूस कर रहे थे—टोल की बढ़ती बोझिल मार, अनियमित ढांचा, और हर कुछ किलोमीटर पर खड़े बैरियर। संसद में दिया गया यह सरकारी डेटा सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के कामकाज, प्राथमिकताओं और नीति-निर्माण की मानसिकता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि देश में प्रति व्यक्ति सबसे अधिक टोल वसूली हरियाणा में होती है—₹917.1 प्रति नागरिक, जो पूरे भारत में नंबर एक है।

यह तथ्य चौंकाता इसलिए भी है क्योंकि हरियाणा का भौगोलिक आकार, जनसंख्या, मार्ग-लंबाई और औद्योगिक स्थिति गुजरात से कई स्तरों पर छोटी है। गुजरात हरियाणा से तीन गुना बड़ा राज्य है, लेकिन वहाँ टोल वसूली हरियाणा से कम है। यह अंतर सिर्फ क्षेत्रफल का नहीं, बल्कि प्रशासनिक दूरदृष्टि, नीति-व्यवस्थापन और सार्वजनिक हित के मूल्यांकन का अंतर दिखाता है।

जब यह सामने आता है कि गुजरात में कुल 62 टोल प्लाज़ा हैं, वहीं हरियाणा में 75, तो सबसे पहले सवाल यह उठता है कि आखिर छोटे प्रदेश पर इतनी अधिक वसूली का बोझ क्यों? कौन-सी बाध्यताएँ या प्राथमिकताएँ हैं जिनके चलते हरियाणा में टोल प्लाज़ा की घनत्व अन्य राज्यों से कहीं अधिक है? टोल की संख्या अपने आप में समस्या नहीं है; समस्या वहाँ बनती है जहाँ नियमों का पालन न हो, दूरी का मानक तोड़ा जाए, और जनता की जेब से अधिकतम वसूली की कोशिश व्यवस्था के लक्ष्य के रूप में स्थापित हो जाए।

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के नियमों के अनुसार, दो टोल प्लाज़ा के बीच न्यूनतम दूरी 60 किलोमीटर होनी चाहिए। यह नियम इसलिए बनाया गया था कि जनता पर अनावश्यक भार न पड़े और सड़क-सुविधाओं का उपयोग न्यायपूर्ण तरीके से हो। लेकिन हरियाणा का मामला बिल्कुल उलट है—यह देश का अकेला प्रदेश है जहाँ 2 टोल के बीच औसत दूरी 45 किलोमीटर है, यानी स्थापित मानक से 25% कम।

यह अंतर कोई छोटा सांख्यिकीय खेल नहीं, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक गड़बड़ी की ओर संकेत करता है। हरियाणा में सड़कों का जाल जरूर है, लेकिन हर सड़क पर टोल की रणनीति क्या जनसुविधा के अनुरूप है? या फिर यह योजना आर्थिक वसूली का एक ऐसा मॉडल बन गई है जो जनता की जेब पर निरंतर बोझ डालने का काम कर रही है?

टोल प्लाज़ा किसी भी राज्य के लिए दोहरी भूमिका निभाते हैं—आर्थिक संसाधन जुटाना और सड़क निर्माण/रखरखाव में योगदान देना। लेकिन जब टोल से आय इतनी अधिक हो जाए कि लोगों को यात्रा करने से पहले हर 40–50 किलोमीटर पर जेब ढीली करनी पड़े, तब यह व्यवस्था संदेहास्पद लगने लगती है। इस संदर्भ में हरियाणा की तुलना गुजरात से करना नीतिगत विसंगति को और भी उजागर करता है। गुजरात का क्षेत्रफल विशाल है, औद्योगिक गतिविधियाँ अधिक हैं, राजमार्ग कहीं अधिक लंबाई में फैले हैं, फिर भी टोल की संख्या कम है। यह दर्शाता है कि वहाँ योजना संतुलित है, दूरी का औसत मानक के करीब है, और जनता पर अपेक्षाकृत कम दबाव है।

हरियाणा के लोग दोहरी मार झेल रहे हैं—एक तरफ यात्रा की लागत बढ़ रही है, दूसरी तरफ टोल की आवृत्ति। यही कारण है कि प्रदेश में व्यापारियों, किसानों, निजी वाहन चालकों और दैनिक यात्रियों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है। दिल्ली–एनसीआर से जुड़े हर जिले—सोनीपत, झज्जर, गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल, रोहतक—लगभग हर दिशा में टोल प्लाज़ा की भरमार है। यह स्थिति ऐसी है कि कोई भी व्यक्ति 150–200 किमी की यात्रा में तीन से पाँच टोल पार कर लेता है। यह सिर्फ असुविधा नहीं, एक गहरी वित्तीय क्षति है, जो दीर्घकाल में राज्य की गतिशीलता और आर्थिक दक्षता पर प्रभाव डालती है।

प्रश्न यह भी उठता है कि अंततः इस अधिकतम वसूली का उपयोग कहाँ हो रहा है? क्या हरियाणा की सड़कें, फ्लाईओवर, सुरक्षा और मार्ग-गुणवत्ता उतनी ही बेहतर हैं जितनी वसूली अधिक है? क्या जनता को उसके पैसे का समुचित प्रतिफल मिल रहा है? अक्सर देखने में आता है कि कई रास्ते निर्माणाधीन रहते हैं, कई जगहों पर काम धीमा पड़ जाता है, और अनेक स्थानों पर सुविधा अपेक्षित स्तर से कम होती है। यदि वसूली इतनी अधिक है, तो सुविधाएँ भी उसी स्तर की होनी चाहिए। लेकिन जमीन की वास्तविकता इस दावे की पुष्टि नहीं करती।

टोल वसूली को लेकर एक और गंभीर विमर्श यह है कि हर कुछ किलोमीटर पर टोल होने से लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ती है। जब मालवाहक ट्रकों, कृषि उत्पादों और औद्योगिक सामग्री पर टोल का अतिरिक्त भार पड़ता है, तो उसकी कीमत अंततः आम उपभोक्ता तक पहुँचकर महँगाई को बढ़ाती है। इस प्रकार टोल का बोझ सिर्फ यात्रियों पर ही नहीं, पूरे आर्थिक ढाँचे पर पड़ता है। हरियाणा की पहचान कृषि और उद्योग दोनों में अग्रणी प्रदेश की है। ऐसे में टोल की अधिकतम घनत्व व्यापारिक गतिविधियों की गति को धीमा करता है और प्रदेश की प्रतिस्पर्धी क्षमता को कमजोर करता है।

यदि देश के बड़े राज्य नीति के अनुसार टोल दूरी का संतुलन बनाए रख सकते हैं, तो हरियाणा क्यों नहीं? यह सवाल सिर्फ संख्या का नहीं, नियत का है। क्या वाकई नियमों के मुताबिक प्लेसमेंट हुआ? क्या पुनरीक्षण हुआ? क्या राज्य सरकार ने इस पर केंद्र से संवाद किया? क्या स्थानीय जन-प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को नियमित रूप से उठाया? जनता के प्रश्नों का उत्तर तभी मिलेगा जब नीति-निर्माता इस मुद्दे को गंभीरता से लें।

आज जरूरत है कि राज्य और केंद्र मिलकर हरियाणा के टोल ढाँचे का विस्तृत पुनर्मूल्यांकन करें। जिस प्रदेश में औसत दूरी 45 किमी है, वहाँ नियमों के अनुरूप पुनर्व्यवस्था अनिवार्य है। साथ ही, प्रति व्यक्ति इतनी अधिक वसूली का सीधा अर्थ है कि सिस्टम की प्राथमिकताओं में सुधार की आवश्यकता है। जनता कोई मशीन नहीं जिसे टोल का सिक्का डालकर आगे बढ़ा दिया जाए; वह करदाता है, सुविधा चाहता है, और पारदर्शिता का अधिकार रखता है।

अंततः, व्यवस्था को जनता के हित में काम करना चाहिए, न कि जनता को व्यवस्था के हित में मजबूर करना चाहिए। हरियाणा में टोल का यह असंतुलन सिर्फ आर्थिक मसला नहीं; यह शासन की प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब है। अब समय है कि इस असंतुलन को दुरुस्त किया जाए—ताकि सड़कें विकास का माध्यम बनें, बोझ का नहीं।

डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

rkpNavneet Mishra

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