गुरुदेव डॉ.विश्वनाथ त्रिपाठी का भावुक हो जाना: विनय कांत मिश्र

संस्मरण: जनपद सिद्धार्थनगर की विभूति और हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार गुरुदेव डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी सर का सान्निध्य विगत 23 वर्षों से इन पँक्तियों के लेखक को मिलता रहा है।
सिद्धार्थनगर के बिस्कोहर नगर पंचायत के मूल निवासी परम आदरणीय गुरुदेव विश्वनाथ त्रिपाठी इन दिनों दिल्ली के दिलशाद गार्डेन में रहते हैं। उम्र 93 वर्ष के करीब है। अभी पिछले दिनों माता जी का देहांत हो गया। गुरुदेव डॉ.विश्वनाथ त्रिपाठी जी की पत्नी को हम लोग माता जी ही कहते थे। कभी हम लोगों ने उनके नाम को जानने की कोशिश नहीं की। गुरुदेव के शिष्यों के प्रति वे अगाध स्नेह रखती थीं। शिष्य वत्सल डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी सर के प्रत्येक शिष्यों को वे पुत्र की भांति ही मानती थीं। बिना खिलाए वे कभी न आने देती। जब भी दिलशाद गार्डेन जाता तो उनके मातृत्व भाव और वात्सल्य से अभिभूत हो जाता। गुरुदेव जब मूड में होते तो डपट भी देते लेकिन माता जी को हमने कभी नाराज होते नहीं देखा। गुरुदेव अभिभावक की मुद्रा में रहते किंतु माता जी सदैव मां की भूमिका का निर्वहन करतीं।
माता जी के दिवंगत होने के बाद कई दिनों तक सर से बात करने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि क्या कहूं। कहां से पूछूं? किंतु सर ने कहा कि विनय कांत तुमने ठीक सुना है। तुम्हारी माता जी अब नहीं रहीं। आगे कुछ बात करने की हिम्मत नहीं हुई। प्रणाम करके फोन रख दिया। मैं बहुत देर तक उदास बैठा रहा। एक एक कर ढेर सारे दृश्य याद आते गए। उनके लोक व्यवहार की जितनी तारीफ की जाए, कम है। वे देवी थीं। ममत्व और अपनत्व से परिपूर्ण उनका अगाध स्नेह मुझे भी मिला।
परम आदरणीय पूज्य डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी सर सन 1952 में ही दिल्ली विश्वद्यालय में अध्यापन कार्य के लिए गए। हिन्दी साहित्य के मर्मज्ञ, प्रकांड ज्ञानी, वरिष्ठ आलोचक, सर्जक और साहित्यकार के रूप में उन्होंने कीर्ति, यश और प्रतिष्ठा अर्जित की। पहली बार गुरुदेव डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी सर को लोकवादी तुलसीदास किताब के जरिए जाना। उनके उच्च कोटि के अध्ययन से मुखातिब हुआ। किताब इतनी अच्छी लगी, मन में आया कि काश! इसके लेखक से मिल सकूं। बाद में सर की बहुत अधिक कृपा प्राप्त हुई। घंटों सर से बतियाता। एक विलक्षण बात यह कि वे शिष्यों को भी खूब सुनते हैं। एक जनतांत्रिक स्पेश उन्हें इस उम्र में भी हंसने और हंसाने देता है। मैं जब भी उन्हें फोन करता हूं हां विनय कांत बोलो बेटा; सर का इतना कहना फिर कम से कम आधे घंटे की बात, गांव देश का हाल, अवधी बोली में संवाद माटी की खुशबू से हम दोनों तृप्त होते हैं। सर का ठठाकर हंसना इस बार न था। वे बहुत दुःखी थे । संवाद में इस बार करुणा थी। विलाप था। गुरुदेव द्वारा अपनी मिट्टी को प्रणाम करने का मंतव्य था। प्रभु श्रीराम गुरुदेव को दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें। प्रभु श्रीराम अनंत हैं। वे सर्व सुलभ और सर्व व्यापी हैंl

rkpNavneet Mishra

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