परमधामपीठ में गुरुपूर्णिमा महोत्सव उल्लासपूर्वक सम्पन्न

  • दिव्य समाधि मंदिर का लोकार्पण, श्रीमद्‍भागवत रससागर की धारा में भीगा श्रद्धा का समुद्र

बलिया(राष्ट्र की परम्परा) सरयू तट के पावन ग्राम इहा बिहरा स्थित अद्वैत शिवशक्ति परमधामपीठ में गुरुवार को गुरुपूर्णिमा का महोत्सव अद्वितीय आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ सम्पन्न हुआ। हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में यज्ञ की पूर्णाहुति, दिव्य प्रवचन, गुरुपादुका पूजन तथा महाप्रसाद वितरण ने इस आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया गुरुपूर्णिमा के इस पुण्यपर्व पर परमधामपीठ के संस्थापक युगद्रष्टा पूज्य मौनी बाबा की नव निर्मित समाधि मंदिर एवं दिव्य प्रतिमा का लोकार्पण उनके कृपा-पात्र शिष्य एवं पीठाधीश्वर श्री शिवेन्द्र ब्रह्मचारी ‘उड़िया बाबा’ के करकमलों द्वारा किया गया। इस गरिमामयी अवसर पर समाजसेवी श्री योगेश्वर सिंह, पूर्व वन मंत्री श्री राजधारी सिंह समेत अनेक श्रद्धालु एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे। गुरुतत्त्व की महागाथा: व्यासपीठ से श्री अतुल कृष्ण भामिनी शरण का ओजस्वी उद्बोधन वृन्दावनधाम से पधारे प्रख्यात संत श्री अतुल कृष्ण भामिनी शरण ने अपने ओजस्वी और भावभीने प्रवचन में कहा सूर्य के ताप को सहना कठिन है, किन्तु वही तेज जब गुरु के माध्यम से शीतल होकर पहुँचता है, तब जीवन प्रकाशित हो उठता है। गुरु ही निजस्वरूप का बोध कराते हैं। वे बाहरी नहीं, भीतर के अन्धकार को हरते हैं। हनुमानजी का ‘मैं’ जब दशानन से भिन्न होता है तो वह ‘रामदास’ बन जाता है – यही सच्चा परिचय है
उन्होंने आगे कहा,गुरु केवल पथ प्रदर्शक नहीं, वे चतुरानन हैं – एक मुख से मन्त्र, दूसरे से उपदेश, तीसरे से साधना और चौथे से प्रसाद। जब आप तीर्थ जाते हैं तो पुण्य पाते हैं, किन्तु जब आप गुरुधाम आते हैं, तो आत्मा का पुनर्जन्म होता है उड़िया बाबा को दी गयी राजसूय यज्ञ की दिव्य विरासत यज्ञाचार्य पं. रेवतीरमण तिवारी ने कहा कि गुरुवाणी अमर है, वह शरीर से नहीं, चेतना से जुड़ी होती है। पूज्य श्री मौनी बाबा ने अपने जीवन के अंतिम काल में राजसूय यज्ञ का संकल्प अपने उत्तराधिकारी उड़िया बाबा को सौंपते हुए स्पष्ट कर दिया कि गुरुकृपा की वह अमृतधारा अब उनके द्वारा प्रवाहित होती रहेगी।उन्होंने यह भी जोड़ा मौनी बाबा ने लोककल्याण की भावना से जो अध्यात्मगंगा प्रवाहित की, वह उड़िया बाबा के माध्यम से आगे बढ़ेगी। यही संकल्प उन्हें सौंपा गया है – केवल एक गद्दी नहीं, एक युगपरंपरा की मशाल महाप्रसाद एवं भक्ति का सतत प्रवाह गुरुपादुका पूजन के उपरांत श्रद्धालुओं ने यज्ञ में आहुतियाँ दीं, दिव्य भाव से सराबोर होकर गुरुचरणों में शीश नवाया। रात्रि तक महाप्रसाद वितरण और कीर्तन भजन का क्रम चलता रहा। भक्तों ने अनुभव किया कि यह केवल आयोजन नहीं, एक दिव्य अनुभूति थी जिसमें गुरु न केवल उपस्थित थे, बल्कि हर हृदय में स्पंदित हो रहे थे।

Editor CP pandey

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