समय, सत्ता, संपत्ति और शरीर
कभी हमारा साथ दें या नहीं दें,
अच्छा स्वभाव, समझ, सत्संग,
संबंध व सत्कर्म सदा साथ देते हैं।
कर्म फल से तो स्वयं ईश्वर भी,
अपने को मुक्त नहीं कर पाये थे,
त्रेता में चौदह वर्ष वनवास भोगे थे,
द्वापर में देवकी के गर्भ से जन्मे थे।
माता कैकेयी अपने कर्म फल
पाकर देवकी बनकर आयी थीं,
श्रीराम श्रीकृष्ण बन कर मथुरा
में जन्म लेकर अवतार लिये थे।
चौदह वर्ष का कर्मफल श्री राम
ने वनवास के रूप में भोगा था,
देवकी वसुदेव ने भी चौदह वर्ष
कंस की कारागार में भोगा था।
कैकेयी के स्वार्थ पूर्ण वरदान के
कर्म द्वापर में अभिशाप बन गये,
आदित्य स्वार्थ वश पाप होता है,
जीवन का सत्कर्म पुण्य देता है।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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