ब्रह्माण्ड रचयिता ने अपने सृजन में,
विश्व के कुछ देवदूतों को चुना होगा,
विविधता से युक्त धर्मों व पंथों का
पर्यटक अग्रदूत बनाकर भेजा होगा।
उसके उद्देश्य विश्व के मानव जगत में,
शान्ति व सौहार्द की स्थापना रहे होंगे,
और यही दूत पर्यटन के साथ शान्ति
सौहार्द के संदेश लेकर निकले होंगे।
कालांतर में धर्म प्रसारण उद्देश्य हेतु,
उन्होंने सारे जग में भ्रमण किया होगा,
शांति और सौहार्द स्थापना हेतु ही
विभिन्न धर्मों- पंथों ने दूत भेजा होगा।
बाइबिल के पाठ पढ़ाने को ईसाई,
बुद्धा की सीखें देने बौद्ध निकले होंगे,
लाखों प्रवर्तक इस्लामी भी विश्व में,
क़ुरान की आयतें फैलाने निकले होंगे।
इसी शृंखला में वह यह सभी प्रवर्तक
भारत की समृद्धि देख भारत में आये,
सोने की चिड़िया के लालच में उसका
शिकार करने शिकारी बन कर आये।
धर्म को झूठे अहंकार ने धर्मच्युत
कर विधर्मी बनाने का प्रयत्न किया,
भारत में भारतीयता का विरोध हुआ,
फलत: उनका डटकर प्रतिरोध हुआ।
वो आततायी यह भूल गए कि ईश्वर
एक है, वह ही तो सबका मालिक है,
उसका बनाया इंसान मालिक नहीं,
बस प्रकृति का अस्थायी नौकर है।
अपनी अस्थायी स्थिति इंसान को
याद रहे तो फिर विश्व में अशांति,
असंतोष, ईर्ष्या, रंगभेद न रह जायें,
और विश्व शांति स्थापित हो जाये।
विश्व शांति स्थापना की स्थिति
अब भी जग में प्रतिकूल नहीं है,
विश्वबंधुत्व का पाठ यदि पढ़िए,
आदित्य शांति सौहार्द स्थापित है।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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