युवा ऊर्जा को दिशा देने की ज़रूरत

संपादकीय

   भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश है। यही युवा, यही जेनरेशन ज़ी, देश के भविष्य का चेहरा है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के युग में जन्मी यह पीढ़ी तेज़, जागरूक और आत्मविश्वासी है। लेकिन इस गति के साथ-साथ इसके सामने कुछ ऐसी चुनौतियाँ भी हैं, जो यदि समय रहते न सुलझाई गईं, तो देश के विकास मार्ग को प्रभावित कर सकती हैं।
       डिजिटल दुनिया ने इस पीढ़ी को अभूतपूर्व अभिव्यक्ति का मंच दिया है, लेकिन इसके साथ पहचान का भ्रम भी गहराया है। सोशल मीडिया की दुनिया में जहाँ ‘लाइक्स’ और ‘फॉलोअर्स’ सफलता का पैमाना बन चुके हैं, वहीं युवाओं में आत्मविश्वास और आत्म-संतोष का संकट बढ़ा है। लगातार तुलना और प्रतिस्पर्धा के दबाव में कई युवा मानसिक तनाव और अवसाद से जूझ रहे हैं।
     भारत की शिक्षा प्रणाली अब भी रटंत और परीक्षा केंद्रित है, जबकि जेन-ज़ी क्रिएटिविटी, नवाचार और व्यावहारिक कौशल की ओर झुकाव रखती है। ऐसे में शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई गहरी होती जा रही है। एआई और ऑटोमेशन के बढ़ते दौर में पारंपरिक नौकरियाँ सिकुड़ रही हैं और नए कौशलों की मांग बढ़ रही है। लेकिन नीति और व्यवस्था उस गति से नहीं बदल रही, जितनी तेज़ यह पीढ़ी बदल रही है।
     रील्स, गेमिंग और ऑनलाइन ट्रेंड्स की लत ने ध्यान और धैर्य को कम किया है। जेन-ज़ी की एक बड़ी संख्या ‘वर्चुअल दुनिया’ में जी रही है, जहाँ सफलता त्वरित है लेकिन स्थायित्व नहीं। यह प्रवृत्ति उन्हें वास्तविक चुनौतियों और ज़मीनी अनुभवों से दूर कर रही है।
    यह पीढ़ी जागरूक है, संवेदनशील भी। जलवायु परिवर्तन, लैंगिक समानता और मानवाधिकार जैसे विषयों पर आवाज़ उठाने में पीछे नहीं रहती। लेकिन आंदोलन की स्थायित्व क्षमता कम है। सोशल मीडिया अभियानों से आगे बढ़कर वास्तविक सामाजिक परिवर्तन के लिए दीर्घकालिक समर्पण की ज़रूरत है।
     फिर भी, उम्मीद जेन-ज़ी से ही है। यही वह पीढ़ी है जो परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बना सकती है। स्टार्टअप कल्चर, डिजिटल नवाचार और सामाजिक उद्यमिता के क्षेत्र में उसके प्रयास भारत को नई ऊँचाइयों पर पहुँचा सकते हैं। सवाल बस यही है — क्या हम इस ऊर्जा को सही दिशा दे पा रहे हैं?
        भारत का भविष्य उसी दिन सुनिश्चित होगा, जब उसकी युवा पीढ़ी आत्ममंथन के साथ आत्मनिर्माण की दिशा में बढ़ेगी। सरकार, समाज और शिक्षा जगत को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहाँ यह पीढ़ी न केवल तकनीक में आगे बढ़े बल्कि मूल्य, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता में भी अग्रणी बने। तभी भारत का अमृतकाल साकार होगा।

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