विघ्नों के बीच विवेक — गणेश जी की शास्त्रोक्त शिक्षाएँ और आत्मबोध का मार्ग
भक्ति डेस्क -राष्ट्र की परम्परा
संसार में हर मानव एक ऐसी यात्रा पर है, जहाँ राहें कभी सरल तो कभी कांटों से भरी होती हैं। जीवन के इस चक्र में जब व्यक्ति दिशा भटकता है, तब उसे एक ऐसे प्रकाश की आवश्यकता होती है जो केवल मार्ग ही नहीं, बल्कि मार्ग का सार भी समझाए। यही कारण है कि शास्त्रों में गणेश जी को केवल विघ्नहर्ता ही नहीं, अपितु बुद्धि, विवेक और आत्मज्ञान का अधिष्ठाता देव माना गया है।
जहाँ बाहरी विघ्नों के साथ-साथ भीतर के अज्ञान, क्रोध, अहंकार और मोह जैसे विघ्नों से मुक्ति का शास्त्रोक्त संदेश निहित है।
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गणेश जी का मूक उपदेश — मौन में समाया सत्य
एक प्रसिद्ध शास्त्रोक्त प्रसंग के अनुसार, एक बार पार्वती माता ने गणेश जी से पूछा— “पुत्र, धर्म और अधर्म का अंतर कैसे पहचाना जाए?”
गणेश जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। वे केवल अपने मौस (मूषक वाहन) की ओर देख मुस्कुरा दिए। माता पार्वती आश्चर्य में पड़ गईं। तभी महादेव ने कहा— “जो अपने मन-रूपी मूषक को वश में कर ले, वही धर्म का वास्तविक स्वरूप जान लेता है।”
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यह प्रसंग दर्शाता है कि मन ही सबसे बड़ा विघ्न है, और मन का नियंत्रण ही सबसे बड़ी पूजा। गणेश जी की साधना केवल पुष्प, दुर्वा या मोदक नहीं, बल्कि आत्म-नियंत्रण, धैर्य और विवेक की साधना है।
विघ्नों का वास्तविक अर्थ — शत्रु नहीं, गुरु
मनुष्य अक्सर हर बाधा को दुर्भाग्य समझ लेता है, परंतु गणेश जी की शास्त्रोक्त व्याख्या में विघ्न परीक्षा होते हैं, दंड नहीं। वे हमें रोकते नहीं, बल्कि हमें मज़बूत बनाते हैं।
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जब किसी कार्य के आरंभ में गणेश वंदना की जाती है, तो उसका उद्देश्य केवल बाधाओं का नाश नहीं होता, बल्कि यह स्मरण होता है कि—
“मैं जो करने जा रहा हूँ, उसमें मेरा विवेक जाग्रत रहे।”
गणेश जी विघ्नों को हराकर नहीं, उन्हें समझाकर मनुष्य को विजय का मार्ग दिखाते हैं।
विघ्नों के बीच विवेक — गणेश जी की शास्त्रोक्त शिक्षाएँ और आत्मबोध का मार्ग
गणेश जी की सबसे महान शिक्षा यह है कि विजय दूसरों पर नहीं, स्वयं पर होती है। जो अपने भीतर के क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और घमंड पर नियंत्रण पा लेता है, वही सच्चा विजेता है।
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शास्त्र कहते हैं—
“गजानन की पूजा में प्रथम अर्घ्य मन को अर्पित होता है।”
अर्थात् जब तक मन शुद्ध न हो, तब तक किसी भी पूजा का फल अधूरा है। यह तत्व आज के युग में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है जहाँ व्यक्ति के पास सब कुछ है पर शांति नहीं।
इस कथा का संदेश — भीतर का गणेश जागृत करो
यह शास्त्रोक्त कथा यही स्मरण कराता है कि:
वास्तविक विघ्न बाहर नहीं, अंदर हैं
वास्तविक पूजा मंदिर में नहीं, मन में है
वास्तविक आशीर्वाद मंत्रों में नहीं, कर्मों में है
जब कोई व्यक्ति प्रेम, करुणा और धैर्य का मार्ग अपनाता है—तभी उसके जीवन की परिक्रमा पूर्ण होती है।
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गणेश जी की कृपा का अर्थ केवल संकटों से बचाव नहीं, बल्कि कठिनाइयों में भी स्थिर बने रहने की शक्ति है।
आज का मनुष्य जितना बाह्य जगत में भटक रहा है, उतना ही उसे गणेश तत्व की आंतरिक साधना की आवश्यकता है। इस ज्ञान में ही जीवन का वास्तविक सुख और शांति है।
एपिसोड – 4
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