सुनीता कुमारी, बिहार
इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य ने पहले जंगल काटकर जानवरों का विनाश किया और अब पर्वत–पहाड़ काटकर पर्यावरण को नष्ट कर रहा है। जिस दिन से मानव ने स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझना शुरू किया, उसी दिन से विनाश की पटकथा लिखी जाने लगी।प्रारम्भ में जंगल थे—हरे, घने और जीवन से भरपूर। वे केवल पेड़ों का समूह नहीं थे, बल्कि असंख्य जीव-जंतुओं का घर, नदियों का स्रोत, वर्षा का आधार और पृथ्वी की साँसें थे। किंतु तथाकथित विकास के नाम पर सबसे पहला प्रहार इन्हीं जंगलों पर हुआ। कुल्हाड़ियाँ चलीं, आरे गरजे और देखते-देखते हजारों वर्षों में विकसित वन कुछ ही दशकों में उजाड़ दिए गए।जंगलों के कटने का सबसे पहला और गहरा दुष्परिणाम वन्यजीवों पर पड़ा। उनके आवास नष्ट हुए, भोजन के स्रोत समाप्त हो गए और वे या तो मानव बस्तियों की ओर भटकने लगे या सदा के लिए विलुप्त हो गए। बाघ, हाथी, गैंडे और असंख्य पक्षी—जो कभी जंगलों की पहचान थे—आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। मनुष्य ने इसे प्रगति कहा, जबकि यह प्रकृति के संतुलन का सुनियोजित विनाश था।जंगलों के बाद मानव की दृष्टि पर्वतों पर पड़ी। जो पर्वत लाखों वर्षों से पृथ्वी की रीढ़ बनकर खड़े थे, नदियों को जन्म देते थे, मौसम को संतुलित रखते थे और भूस्खलन व भूकंप के प्रभाव को कम करते थे—आज वही पर्वत विकास परियोजनाओं की भेंट चढ़ रहे हैं। पहाड़ों को काटकर सड़कें, सुरंगें, खदानें और शहर बसाए जा रहे हैं। विस्फोटों से पर्वतों की छाती छलनी की जा रही है, मानो वे निर्जीव पत्थरों का ढेर हों।पर्वतों के कटने का प्रभाव केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक है। नदियाँ सूख रही हैं, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, वर्षा चक्र असंतुलित हो रहा है और प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ रही हैं। बाढ़, भूस्खलन, भूकंप और सूखा—ये सब प्रकृति की चेतावनियाँ हैं, जिन्हें मनुष्य बार-बार अनदेखा कर रहा है। पर्वतों के साथ-साथ वहाँ रहने वाले लोगों की संस्कृति, आजीविका और भविष्य भी संकट में पड़ रहा है।विडंबना यह है कि मनुष्य स्वयं को सबसे बुद्धिमान प्राणी मानता है, फिर भी सबसे अधिक आत्मघाती निर्णय वही ले रहा है। जंगल काटकर उसने जानवरों का विनाश किया और अब पर्वत काटकर वह अपने ही भविष्य को अंधकार में धकेल रहा है। पर्यावरण का यह संकट किसी एक देश या क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि पूरी मानवता के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है।अब भी समय है कि मनुष्य रुके, सोचे और अपनी दिशा बदले। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना असंभव नहीं है, बशर्ते लालच के स्थान पर संवेदनशीलता और तात्कालिक लाभ के स्थान पर दीर्घकालिक सोच अपनाई जाए। जंगलों का संरक्षण, पर्वतों का सम्मान और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही मानव सभ्यता को बचा सकता है।यदि आज भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें विकासकर्ता नहीं, बल्कि विनाशकर्ता के रूप में याद करेंगी। प्रकृति ने हमें जीवन दिया है—अब यह हमारा दायित्व है कि हम उसके अस्तित्व की रक्षा करें, न कि उसके विनाश की तैयारी।
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