नेताओं और दलों की संपत्ति पर नजर रखने के लिए बने स्थायी आयोग, पूर्व विधायक की बड़ी मांग

भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में हांफता लोकतंत्र! मदन गोविंद राव बोले- आय-संपत्ति आयोग बनाकर नेताओं और अधिकारियों की हो जांच


कुशीनगर (राष्ट्र की परम्परा)। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कानूनों और सुशासन के दावों के बावजूद आम आदमी को राहत क्यों नहीं मिल रही? थानों से लेकर तहसीलों तक कथित भ्रष्टाचार पर लगाम कैसे लगेगी? जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों की जवाबदेही कैसे तय होगी? पूर्व विधायक मदन गोविंद राव ने इन सवालों को उठाते हुए व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत बताई है। उन्होंने जनप्रतिनिधियों और मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों की आय एवं संपत्ति की निगरानी के लिए स्थायी आय एवं संपत्ति आयोग गठित करने की मांग की। रामकोला में अपने जन्मदिन पर आयोजित पुराने मित्रों और कार्यकर्ताओं के मिलन समारोह के बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के बिना आर्थिक विषमता दूर करना और देश को विश्वशक्ति बनाने का लक्ष्य हासिल करना कठिन है।

‘भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी, आम आदमी बेबस’
मदन गोविंद राव ने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार की समस्या केवल आर्थिक अनियमितताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संगठित अपराध, हिंसा और सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देती है। उनके मुताबिक, जम्मू-कश्मीर की स्थिति को लेकर 1992-93 में की गई अध्ययन यात्रा के दौरान उन्हें लगा था कि भ्रष्ट तंत्र और कथित राजनीतिक संरक्षण ने आतंकवाद तथा अलगाववाद की परिस्थितियों को बढ़ाने में भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक संवेदनहीनता ने कुछ क्षेत्रों में नक्सल आंदोलन के लिए भी अनुकूल माहौल बनाया। उन्होंने संपूर्ण क्रांति, बोफोर्स विरोधी आंदोलन और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारें बदलने के बावजूद भ्रष्टाचार की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस शासन के दौरान इन मुद्दों पर आंदोलनों के चलते उन्हें करीब 14-15 बार जेल जाना पड़ा।
तहसीलों से टेंडर तक उठाए सवाल
पूर्व विधायक ने आरोप लगाया कि जमीन के बैनामे के बाद दाखिल-खारिज, वरासत और राजस्व संबंधी मामलों में लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्होंने थानों, तहसीलों और अधीनस्थ अदालतों में कथित भ्रष्टाचार पर चिंता जताते हुए मामलों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की। नारायणी नदी के किनारे अवैध बालू खनन का उदाहरण देते हुए उन्होंने एक पुराने घटनाक्रम का जिक्र किया। उनके अनुसार, मौके पर जांच के दौरान कथित तौर पर बालू लदी ट्रैक्टर-ट्रॉलियां गुजर रही थीं, लेकिन अधिकारी ने खनन से इनकार किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकारी परियोजनाओं के टेंडर कथित रूप से चहेती फर्मों को लाभ पहुंचाने के लिए तैयार किए जाते हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।
भ्रष्टाचार रोकने के लिए सुझाए ये बड़े बदलाव
मदन गोविंद राव ने कहा कि भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण से ग्रामीण बाजारों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं और बैंकों में बचत को प्रोत्साहन मिल सकता है। इसके लिए उन्होंने सूचना का अधिकार कानून को अधिक प्रभावी बनाने, सिटिजन चार्टर के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई, चुनावी खर्च पर नियंत्रण और स्वतंत्र लोकपाल संस्था को मजबूत करने का सुझाव दिया। उन्होंने प्रत्येक कमिश्नरी में न्यायपालिका से संबंधित भ्रष्टाचार की शिकायतों की निष्पक्ष जांच के लिए अलग व्यवस्था बनाने की वकालत भी की। साथ ही, राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की आय-संपत्ति की जांच के लिए स्थायी आयोग गठित करने तथा गंभीर मामलों में दोषसिद्धि होने पर राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि किसी आरोपी के संबंध में अपुष्ट सूत्रों के आधार पर खबर प्रकाशित करने पर रोक लगाने के लिए कानून में बदलाव होना चाहिए। उनके मुताबिक, लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए राजनीतिक दलों में ईमानदार कार्यकर्ताओं को तैयार करना और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। पूर्व विधायक का संदेश साफ है: भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल नारों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था, निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने से ही निर्णायक मुकाम तक पहुंच सकती है।

Editor CP pandey

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