ई-वोटिंग: लोकतंत्र की मजबूती या तकनीकी जटिलता?

ई-वोटिंग मतदान प्रक्रिया को सरल, सुलभ और व्यापक बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है। बिहार के प्रयोग से स्पष्ट है कि मोबाइल ऐप के माध्यम से मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी संभव है। हालांकि, तकनीकी पहुंच, साइबर सुरक्षा, मतदाता की पहचान और गोपनीयता जैसी चुनौतियाँ इस प्रणाली के समक्ष खड़ी हैं। डिजिटल असमानता और भरोसे की कमी को दूर किए बिना इसका व्यापक क्रियान्वयन उचित नहीं होगा। ई-वोटिंग का भविष्य उज्ज्वल है, बशर्ते इसे संतुलित, सुरक्षित और समावेशी ढंग से लागू किया जाए।

✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है– जनभागीदारी। यह भागीदारी जितनी व्यापक होती है, उतना ही लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन जब आम चुनावों में भी 100 में से केवल 60-65 लोग ही अपने मताधिकार का उपयोग करते हैं, तो सवाल उठता है कि शेष 35-40 प्रतिशत वोटर क्यों चुप रह जाते हैं? क्या यह निष्क्रियता है, उदासीनता है, या व्यवस्था की असुविधा?

इस संदर्भ में ई-वोटिंग (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग, मोबाइल या इंटरनेट के माध्यम से) को भविष्य का समाधान बताया जा रहा है। हाल ही में बिहार में हुए नगर निकाय उपचुनाव में एक ऐतिहासिक प्रयोग हुआ — मोबाइल ऐप के जरिए कुछ क्षेत्रों में वोटिंग करवाई गई और उस क्षेत्र में मतदान प्रतिशत उल्लेखनीय रूप से बढ़ा। यह प्रयोग कई मायनों में संकेत देता है कि यदि तकनीक को सही तरीके से अपनाया जाए तो चुनावी भागीदारी क्रांतिकारी रूप से बढ़ सकती है।

कई बार यह माना जाता है कि जो लोग वोट नहीं डालते, वे लोकतंत्र को गंभीरता से नहीं लेते। लेकिन यह दृष्टिकोण अधूरा है। प्रवासी मजदूर, जो चुनाव के समय अपने घर नहीं लौट पाते; वृद्ध या अस्वस्थ नागरिक, जो लंबी कतारों में खड़े नहीं हो सकते; और दूरदराज क्षेत्रों के नागरिक, जहाँ मतदान केंद्र तक पहुँचना एक कठिनाईपूर्ण कार्य है – इन सभी को यदि घर बैठे सुरक्षित और विश्वसनीय माध्यम से वोट डालने का विकल्प मिले, तो शायद भारत का मतदान प्रतिशत 90% तक पहुँच सकता है।

ई-वोटिंग का सबसे बड़ा लाभ है सुलभता। मोबाइल फोन आज हर हाथ में है। यदि बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, नौकरी आवेदन – सब कुछ मोबाइल से हो सकता है, तो मतदान क्यों नहीं? ई-वोटिंग से लाइन में लगने की आवश्यकता नहीं रहती, दिव्यांगजन और बुजुर्गों के लिए राहत होती है, कामकाजी वर्ग को कार्यालय से छुट्टी लेने की बाध्यता नहीं होती और प्रवासी नागरिक भी मतदान कर सकते हैं। यह तकनीक ‘हर मतदाता तक पहुंचने’ के लक्ष्य को साकार कर सकती है।

ई-वोटिंग जितनी आकर्षक है, उतनी ही चुनौतियों से घिरी भी है। सबसे पहले साइबर सुरक्षा का प्रश्न आता है – क्या वोट सुरक्षित रहेंगे? क्या हैकिंग या डेटा लीक से लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है? दूसरा प्रश्न है प्रामाणिकता – मोबाइल पर वोट डालने वाले व्यक्ति की पहचान कैसे सुनिश्चित होगी कि वह वही मतदाता है? तीसरा प्रश्न है गोपनीयता – वोट की गोपनीयता कैसे कायम रहेगी जब व्यक्ति अपने घर में बैठकर वोट डाल रहा है? चौथा प्रश्न है टेक्नोलॉजी की पहुंच – क्या भारत का हर नागरिक स्मार्टफोन, इंटरनेट और ऐप का उपयोग करने में सक्षम है?

बिहार नगर निकाय चुनाव में ई-वोटिंग को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया था। मोबाइल ऐप आधारित वोटिंग से बूथ स्तर पर बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत दर्ज किया गया। इससे यह प्रमाणित हुआ कि तकनीक अपनाने से न केवल सुविधा बढ़ती है, बल्कि मतदाता सक्रियता भी। लेकिन इसे पूर्णतः सफल मानना जल्दबाजी होगी। यह प्रयोग सीमित क्षेत्र, चयनित मतदाताओं, और निगरानी में किया गया था। पूरे देश में इस मॉडल को लागू करना वृहद तैयारी, भरोसेमंद तकनीकी आधारभूत ढाँचा और कानूनी वैधता की मांग करेगा।

भारत में आज भी 70 करोड़ से अधिक लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, जिनमें से बहुतों के पास स्मार्टफोन या तेज इंटरनेट नहीं है। डिजिटल साक्षरता की कमी, महिलाओं की तकनीकी पहुंच, बुजुर्गों का तकनीक के प्रति झुकाव – यह सभी कारक ई-वोटिंग को समावेशी नहीं, बल्कि विभाजनकारी बना सकते हैं, यदि इसे बिना तैयारी के लागू किया जाए।

इसलिए आवश्यक है कि वोटर वेरिफिकेशन सिस्टम तैयार किया जाए, जैसे आधार कार्ड आधारित OTP, फेस रिकग्निशन, या बायोमेट्रिक लॉगिन। पहले कुछ महानगरों या संस्थानों में स्वैच्छिक रूप से इसे लागू कर प्रभाव का अध्ययन किया जाए। हर चरण पर डेटा एन्क्रिप्शन और ट्रैकिंग सिस्टम का निर्माण हो। ग्रामीण और अशिक्षित वर्ग को तकनीकी मतदान की प्रक्रिया समझाई जाए। यह भी आवश्यक है कि कोई भी वोटर दबाव में या निगरानी में वोट न करे, इसके लिए गोपनीयता कानून स्पष्ट हों।

ई-वोटिंग लोकतंत्र को और भी पारदर्शी बना सकती है, बशर्ते उस पर जनविश्वास हो। यदि सही तकनीक, मजबूत साइबर सुरक्षा, पारदर्शिता, और व्यापक जनशिक्षा को मिलाया जाए, तो ई-वोटिंग न केवल मतदान प्रतिशत बढ़ा सकती है, बल्कि लोकतंत्र को सशक्त, समावेशी और समयानुकूल बना सकती है।

कोई भी प्रणाली तभी सफल होती है जब उस पर जनविश्वास हो। ई-वोटिंग में सबसे बड़ी चुनौती है लोगों का भरोसा जीतना। जिस दिन यह विश्वास बन जाएगा कि “मोबाइल पर दिया गया मेरा वोट उतना ही सुरक्षित और गोपनीय है जितना मतदान केंद्र पर”, उसी दिन भारत में 90% से अधिक मतदान हो सकता है।

ई-वोटिंग कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक संभावनाशील भविष्य है। लेकिन इसे जल्दबाजी में नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, समावेशिता और सुरक्षा के साथ अपनाना होगा। लोकतंत्र की मजबूती केवल कानूनों से नहीं, बल्कि हर नागरिक की भागीदारी से बनती है। और यदि तकनीक उस भागीदारी को सहज बना सकती है, तो क्यों न उसका स्वागत किया जाए – सोच-समझकर, संतुलन के साथ।

Editor CP pandey

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