भारत और संसार के इतिहास में 9 दिसंबर केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उन विभूतियों की स्मृति है जिन्होंने अपने शब्दों, कर्मों, साहस और सेवा से मानवता को नई दिशा दी। यह लेख 9 दिसंबर को दिवंगत हुए उन महान व्यक्तित्वों के जीवन, उनके जन्म-स्थल, प्रदेश और समाज के लिए दिए गए योगदान को संवेदनशील और विस्तृत रूप से उजागर करता है।
हिंदी साहित्य के आधुनिक दौर के सबसे सशक्त कवियों में मंगलेश डबराल का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। उनका जन्म उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जनपद में हुआ था। हिमालय की शांत वादियों में पले-बढ़े मंगलेश जी के भीतर प्रकृति, पीड़ा और सामाजिक यथार्थ की गहरी संवेदना बस गई थी। वे केवल कवि ही नहीं बल्कि एक सजग पत्रकार भी थे।
उनकी कविताएँ आम आदमी के संघर्ष, शोषण, राजनीति और मानवीय संवेदनाओं को बेहद सादगी और प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करती हैं। ‘घर का रास्ता, आवाज़ भी एक जगह है’ जैसी उनकी कृतियाँ साहित्य जगत में विशेष महत्व रखती हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनकी लेखनी की सशक्तता का प्रमाण है।
9 दिसंबर 2020 को उनका निधन कोरोना संक्रमण के कारण हुआ, जिसने साहित्य जगत को गहरा आघात पहुँचाया। उनकी कविताएँ आज भी युवाओं को सोचने और संघर्ष करने की प्रेरणा देती हैं।
भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत में तबले की थाप से आत्मा को झंकृत कर देने वाले उस्ताद हनीफ मोहम्मद खाँ का जन्म उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद में हुआ था। वे लखनऊ घराने के प्रमुख तबला वादकों में से एक माने जाते थे। संगीत उन्हें विरासत में मिला था और वर्षों के कठिन रियाज़ से उन्होंने तबले को अपनी साधना बना लिया।
उन्होंने भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भारतीय ताल और लय की गरिमा को ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनके उँगलियों की गति और ताल का संतुलन सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता था। कई प्रसिद्ध गायकों और वादकों के साथ उन्होंने मंच साझा किया।
9 दिसंबर 2009 को उनका देहांत हुआ, पर उनकी ताल आज भी संगीत प्रेमियों के हृदय में जीवित है। वे अपने पीछे एक समृद्ध संगीत विरासत छोड़ गए।
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में जन्मे त्रिलोचन शास्त्री प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं। वे छायावाद के बाद आए नए प्रयोगवादी युग के सशक्त कवि थे। उनकी कविता में गांव, खेत, मजदूर, किसान और आम जीवन की वास्तविक छवि दिखाई देती है।
त्रिलोचन जी की विशेषता थी – सीधी, सरल और जनमानस से जुड़ी भाषा। उन्होंने दिखावटी साहित्य नहीं, बल्कि जमीन से जुड़ा साहित्य लिखा। उनकी रचनाएँ सामाजिक विषमता, श्रम और मानवीय संघर्ष की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।
9 दिसंबर 2007 को उनका निधन हुआ। उनका साहित्य आने वाली पीढ़ियों को सिखाता है कि कविता केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि समाज को जगाने का माध्यम है।
उन्होंने संसद में रहते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण विकास जैसे विषयों पर लगातार आवाज उठाई। जनता से उनका गहरा लगाव और सादगी भरा जीवन उन्हें एक जनप्रिय नेता बनाता था।
9 दिसंबर 2000 को उनके निधन से राजनीतिक जगत ने एक ईमानदार और कर्मयोगी नेता को खो दिया। आज भी उनके योगदान को सम्मान के साथ याद किया जाता है।
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने राजनीति और समाज सेवा के क्षेत्र में भी कार्य किया। वे सैनिक अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और साहस के प्रतीक थे।
9 दिसंबर 1983 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका नाम भारतीय इतिहास में वीरता और बलिदान का अमिट चिन्ह बनकर दर्ज है।
अंतिम क्षण तक वे अपने सैनिकों के साथ डटे रहे और अपने कर्तव्य का पालन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। 9 दिसंबर 1971 को उनका शहीद होना भारतीय नौसेना के इतिहास का सबसे भावुक और गौरवपूर्ण बलिदान माना जाता है।
उनका जीवन युवाओं को देशभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देता है।
आज चीन और भारत दोनों देशों में उन्हें आदर के साथ याद किया जाता है। वे निस्वार्थ सेवा, मानवता और अंतरराष्ट्रीय भाईचारे के प्रतीक बने।
उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों का विरोध करते हुए कई आंदोलनों में भाग लिया। उनकी पहचान एक निर्भीक योद्धा की थी, जिसने अंत तक अन्याय के आगे घुटने नहीं टेके।
9 दिसंबर 1924 को उनका निधन हुआ। लेकिन उनकी वीरता राजस्थानी लोकगीतों और इतिहास के पन्नों में आज भी जीवित है।
9 दिसंबर केवल मौतों की सूची नहीं है, बल्कि यह उन अमर आत्माओं की स्मृति है जिन्होंने अपने जीवन को राष्ट्र, समाज और मानवता के नाम कर दिया। इन सभी महान व्यक्तित्वों का योगदान समय की सीमाओं से परे है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची अमरता कर्मों से प्राप्त होती है, तन के जाने से नहीं।
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