शिक्षा का मकसद केवल पढ़ाई-लिखाई तक सीमित नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना है, जहाँ बालक निडर होकर सोच सके, प्रश्न कर सके और अपने सपनों को आकार दे सके। लेकिन आज का हाल इसके उलट दिखाई दे रहा है। स्कूल, जो बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित जगह माने जाते हैं, अब हिंसा और प्रताड़ना की खबरों से सुर्खियों में हैं। कहीं शिक्षक की मार से बच्चा घायल हो रहा है, तो कहीं साथी छात्रों के बीच विवाद जानलेवा रूप ले रहा है।
यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर हमारी शिक्षा व्यवस्था में संवेदनशीलता की कमी क्यों बढ़ती जा रही है? अनुशासन के नाम पर बच्चों के साथ कठोरता, मारपीट या मानसिक उत्पीड़न किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता। एक डर में पला बच्चा कभी आत्मविश्वासी नहीं बन सकता।
आज भी समाज में यह धारणा गहराई तक बैठी है कि डांट-फटकार या हल्की मार से बच्चा सुधरता है। लेकिन सच्चाई यह है कि इससे बच्चे के भीतर भय और हीनभावना घर कर जाती है। उसे लगता है कि गलती करने का मतलब सजा है, न कि सीखने का अवसर। यही डर आगे चलकर उसकी रचनात्मकता और आत्मविश्वास को खत्म कर देता है। शिक्षा का असली उद्देश्य बच्चे में सोचने और समझने की शक्ति विकसित करना है, न कि उसे डराकर आज्ञाकारी बनाना।
शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि बच्चों के मनोभाव को समझना भी है। आज के बच्चों पर स्कूल और घर दोनों जगह प्रदर्शन का दबाव है। अभिभावकों को भी यह स्वीकार करना होगा कि अंकों से अधिक जरूरी है बच्चे का मानसिक स्वास्थ्य। बच्चों से संवाद बढ़ाना, उन्हें सुनना और उनके विचारों को महत्व देना – यही सही शिक्षा का मार्ग है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ‘भयमुक्त शिक्षा’ की बात कही गई है, लेकिन इसे जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी विद्यालयों और समाज दोनों की है। हर स्कूल में बाल सुरक्षा समिति, मनोवैज्ञानिक परामर्श केंद्र और शिकायत तंत्र होना चाहिए। शिक्षकों को ‘बाल मनोविज्ञान’ और ‘सहानुभूति आधारित अनुशासन’ की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए, ताकि वे बच्चे के विकास में साथी बन सकें, भय का कारण नहीं।
बच्चे समाज का भविष्य हैं। यदि हम उन्हें भय और हिंसा के साये में बड़ा करेंगे, तो वे कभी स्वतंत्र और संवेदनशील नागरिक नहीं बन पाएंगे। शिक्षा का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब हर बालक विद्यालय में सुरक्षित, सम्मानित और निडर महसूस करे। अब वक्त आ गया है कि हम सब मिलकर यह तय करें, शिक्षा का आधार डर नहीं, भरोसा होगा। तभी सच में कहा जा सकेगा , भयमुक्त हो बालक, भयमुक्त हो शिक्षा।
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