डिजिटल प्रदूषण और बचपन पर संकट: सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और जिम्मेदारी का वैश्विक विमर्श
डिजिटल युग ने मानव जीवन को अभूतपूर्व रूप से बदला है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सूचना, संवाद और मनोरंजन को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ ही बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं। आज बचपन जिस डिजिटल वातावरण में आकार ले रहा है, वह पहले की पीढ़ियों से बिल्कुल अलग है। स्क्रीन अब बच्चों की पहली खिड़की बन चुकी है, जहां से वे दुनिया को देखते, समझते और अपनाते हैं।
भारत जैसे देश में, जहां पारिवारिक मूल्य, सामाजिक सहभागिता और आध्यात्मिक परंपराएं जीवन का आधार रही हैं, वहां डिजिटल प्रदूषण एक गंभीर सामाजिक चुनौती के रूप में उभर रहा है। सोशल मीडिया का अनियंत्रित उपयोग न केवल बच्चों की सोच और व्यवहार को प्रभावित कर रहा है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर कर रहा है।
गाजियाबाद सुसाइड मामला: नीति विमर्श का ट्रिगर पॉइंट
हाल ही में गाजियाबाद में सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की लत के कारण तीन सगी बहनों की आत्महत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। यह मामला केवल एक पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि डिजिटल प्रदूषण के खतरों का गंभीर संकेत बन गया है। इस घटना के बाद बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध या सख्त नियमन की मांग तेज हो गई है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते प्रभाव और बच्चों व युवाओं की मानसिक सेहत पर उसके नकारात्मक असर को लेकर चिंता जताई गई थी। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने न्यूनतम आयु सीमा तय करने और सुरक्षित डिजिटल इकोसिस्टम बनाने पर विचार शुरू कर दिया है।
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सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग: मनोरंजन से मानसिक दबाव तक
आज का बच्चा केवल खेल नहीं खेल रहा, बल्कि वह लगातार लक्ष्य, लेवल और चुनौतियों के दबाव में जी रहा है। ऑनलाइन गेमिंग के टास्क-आधारित ढांचे बच्चों में जीत की मजबूरी, हार का डर और आभासी स्वीकृति की चाह पैदा करते हैं। सोशल मीडिया पर तुलना, लाइक्स और फॉलोअर्स आत्म-सम्मान को प्रभावित करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब बच्चा आभासी दुनिया को वास्तविक जीवन से अधिक महत्वपूर्ण मानने लगता है, तब मानसिक जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। इससे तनाव, अवसाद, चिड़चिड़ापन और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं।
ऑस्ट्रेलिया मॉडल: वैश्विक बहस की शुरुआत
डिजिटल खतरे को गंभीरता से लेते हुए ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब, स्नैपचैट और एक्स जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाया। यह फैसला वैश्विक स्तर पर एक नई बहस का आधार बना—क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए डिजिटल स्वतंत्रता को सीमित करना जरूरी हो गया है?
कई देश अब इस मॉडल का अध्ययन कर रहे हैं और अपने सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में इसके प्रभावों का मूल्यांकन कर रहे हैं।
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भारत में डिजिटल लत और बढ़ती सुरक्षा चिंताएं
भारत में भी डिजिटल एडिक्शन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। गाजियाबाद और भोपाल जैसी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ी का मानसिक स्वास्थ्य गंभीर संकट में पड़ सकता है। हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिबंध लागू नहीं हुआ है, लेकिन बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त नियमों पर गंभीर मंथन जारी है।
सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी: मुनाफा बनाम नैतिकता
सोशल मीडिया और गेमिंग कंपनियां एल्गोरिदम के जरिए उपयोगकर्ताओं को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने की रणनीति अपनाती हैं। इससे मुनाफा तो बढ़ता है, लेकिन बच्चों के संदर्भ में यह खतरनाक साबित हो सकता है। आयु सत्यापन, कंटेंट फिल्टर और बच्चों के लिए अलग सुरक्षा ढांचे की कमी इस संकट को और गहरा करती है। अब जरूरत है कि कंपनियां सामाजिक जिम्मेदारी को भी अपने व्यापार मॉडल का हिस्सा बनाएं।
माता-पिता, स्कूल और समाज: पहली सुरक्षा दीवार
पूर्ण प्रतिबंध एक आसान समाधान लगता है, लेकिन व्यवहारिक रूप से यह जटिल है। तकनीक को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। समाधान संतुलन में है—आयु-आधारित एक्सेस, स्क्रीन टाइम लिमिट, कंटेंट मॉडरेशन और डिजिटल साक्षरता। माता-पिता की भूमिका सबसे अहम है। बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर नजर, खुला संवाद और भावनात्मक समर्थन उन्हें आभासी दबाव से बाहर निकाल सकता है।
स्कूलों में डिजिटल एडिक्शन पर काउंसलिंग, खेल, कला और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा देना भी जरूरी है। यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी का विषय है।
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निष्कर्ष: संतुलन ही समाधान
डिजिटल युग को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसे विवेक और संवेदनशीलता के साथ अपनाया जा सकता है। बच्चों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक विकास सरकार, उद्योग, परिवार और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है। सवाल यह नहीं कि तकनीक रहे या न रहे, बल्कि यह है कि तकनीक किसके नियंत्रण में और किस उद्देश्य से रहे। यदि आज संतुलित और साहसी निर्णय नहीं लिए गए, तो कल इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ सकती है।
लेखक एवं संकलनकर्ता:
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
कर विशेषज्ञ, स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि ,गोंदिया, महाराष्ट्र
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