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जातिवादी राजनीति अभिशाप — बिहार के विकास की सबसे बड़ी बाधा

बिहार, जो कभी ज्ञान और संस्कृति का केंद्र माना जाता था, आज भी जातिवादी राजनीति के जाल में उलझा हुआ है। यहाँ की राजनीति लंबे समय से जातिगत समीकरणों पर आधारित रही है। चुनाव आते ही विकास, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दे गौण हो जाते हैं, जबकि जाति और समुदाय की पहचान चुनावी जीत का प्रमुख आधार बन जाती है। राजनीतिक दलों ने इस प्रवृत्ति को न केवल बनाए रखा, बल्कि इसे अपनी शक्ति का साधन बना लिया है। उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनाव प्रचार तक, हर कदम पर जातीय समीकरणों का गणित लगाया जाता है। परिणामस्वरूप, जनता जातीय भावनाओं में विभाजित हो जाती है, और सामूहिक विकास की सोच कमजोर पड़ जाती है। यह जातिवादी राजनीति बिहार की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बन गई है। जब वोट जाति के आधार पर पड़ते हैं, तो नेता जवाबदेही से मुक्त हो जाते हैं। विकास योजनाएँ कागजों तक सीमित रह जाती हैं, रोजगार सृजन की नीतियाँ ठंडे बस्ते में चली जाती हैं, और भ्रष्टाचार तथा अपराध को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो जाता है। उदाहरण: बिहार के गया जिले में हाल के वर्षों में देखा गया कि एक प्रमुख सड़क निर्माण परियोजना, जो ग्रामीण क्षेत्रों को शहर से जोड़ने वाली थी, जातीय समीकरणों के कारण रुकी रही। ठेकेदारों और स्थानीय नेताओं के बीच जाति-आधारित पक्षपात के कारण परियोजना में देरी हुई, जिससे स्थानीय लोगों को बेहतर कनेक्टिविटी और आर्थिक अवसरों का लाभ नहीं मिल सका। यह एक जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे जातिवादी मानसिकता विकास कार्यों को प्रभावित करती है। बिहार को प्रगति के पथ पर अग्रसर होने के लिए इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा। जनता को यह समझना होगा कि जातीय पहचान से ऊपर उठकर केवल योग्य, ईमानदार और विकासोन्मुख नेतृत्व को चुनना ही राज्य की वास्तविक प्रगति का मार्ग है। जब तक राजनीति “जाति” के बजाय “योग्यता और नीति” पर आधारित नहीं होगी, तब तक बिहार अपनी पूर्ण क्षमता को प्राप्त नहीं कर सकेगा। बिहार की राजनीति को जातिवाद की बेड़ियों से मुक्त कर विकास और समानता की दिशा में मोड़ना समय की माँग है। यदि जनता जागरूक होकर मुद्दों पर आधारित राजनीति को अपनाए, तो बिहार पुनः उस गौरवशाली युग की ओर लौट सकता है, जब वह पूरे देश के लिए एक उदाहरण हुआ करता था। जातिवाद की जड़ें
बिहार में राजनीति की दिशा और दशा पर जातीय समीकरणों का गहरा प्रभाव रहा है। चुनाव आते ही नेता विकास, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों से ध्यान हटाकर जाति-आधारित वोट बैंक की राजनीति करने लगते हैं। गाँव-गाँव और मोहल्ले-मोहल्ले में जातीय पहचान के नाम पर समाज को बाँटा जाता है। परिणामस्वरूप, जनता अपने अधिकारों और विकास की बात करने के बजाय “हमारी जाति का नेता कौन है” की सोच में उलझी रहती है। विकास पर प्रभाव
जब राजनीति का आधार योग्यता या नीतियों के बजाय जाति बन जाती है, तो प्रशासनिक पदों से लेकर सरकारी योजनाओं तक में पारदर्शिता और निष्पक्षता समाप्त हो जाती है। जातिवाद के कारण योग्य व्यक्तियों को अवसर नहीं मिलते, और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। विकास की योजनाएँ कागजों तक सीमित रह जाती हैं। शिक्षा और सामाजिक एकता पर प्रभाव
जातिवादी मानसिकता न केवल राजनीति, बल्कि समाज और शिक्षा प्रणाली को भी प्रभावित करती है। बच्चे भी जाति के चश्मे से समाज को देखने लगते हैं, जिससे सामाजिक एकता कमजोर होती है। यह स्थिति एक नए और प्रगतिशील बिहार के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा बन गई है। समाधान की दिशा में कदम
बिहार को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए जातिवाद की जंजीरों को तोड़ना आवश्यक है। इसके लिए: शिक्षा और जागरूकता को प्राथमिकता दी जाए, ताकि लोग मुद्दों पर आधारित मतदान करें।
राजनीतिक दलों को विकास, रोजगार और प्रशासनिक सुधार को अपने चुनावी एजेंडे का आधार बनाना चाहिए।
युवाओं को जातीय सोच से ऊपर उठकर योग्यता और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देनी होगी।
मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग को समाज में सकारात्मक विचारों का प्रसार करना होगा।
क्योंकि जातिवाद की विचारधारा ने बिहार को वर्षों पीछे धकेल दिया हे जब तक राजनीति का आधार जातिवाद रहेगा तब तक वह विकास सिर्फ भाषणों में ही रहेगा। अब समय आ गया हे की हम ऐसे नेताओं को चुने जो बिहार के विकास की सोच रखते हो न की सिर्फ जातिवाद की।बाकी सब आप लोगों के हाथमे हे आपका एक निर्णय वो आनेवाले 5 सालों तक की सोच हे यह याद रखके आगे बढ़ना चाहिए और बिहार के विकास को लक्ष्य में रखकर जनता को आगे बढ़ना चाहिए।

लेखक: चंद्रकांत सी. पूजारी (गुजरात)

Karan Pandey

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