तुर्कमान गेट की घटना कोई अचानक उभरा गुस्सा नहीं, बल्कि कानून और संविधान को ठेंगा दिखाने की सोची-समझी मानसिकता का आईना है। अदालत के आदेश से जब अवैध निर्माण हटाया जाता है, तो पत्थर चलते हैं। पुलिसकर्मी घायल होते हैं। और जब दंगाइयों को अदालत जमानत नहीं देती, तो न्यायपालिका के फैसले पर नहीं, बल्कि मोदी-शाह की “कब्र खोदने” जैसे जहरीले नारे गूंजने लगते हैं। सवाल तीखा है, क्या अब अदालतें भीड़ से पूछकर फैसले देंगी?
संविधान साफ कहता है कि कानून सर्वोच्च है। अदालत का आदेश अंतिम है। प्रशासन उसका पालन करेगा, भावनाओं का नहीं। लेकिन यहां भावनाओं की आड़ में हिंसा को जायज़ ठहराने की कोशिश हो रही है। पत्थरबाज़ी को “प्रतिरोध”, पुलिस पर हमले को “गुस्सा” और अदालत के फैसले को “राजनीतिक बदला” बताया जा रहा है। यह तर्क नहीं, अराजकता है।
पुलिस पर हमला लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, सीधा अपराध है। अदालत के आदेश के खिलाफ हिंसा कोई आंदोलन नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था पर सीधा हमला है। और जमानत न मिलने पर धमकी भरे नारे। यह न्यायपालिका को डराने की कोशिश नहीं तो और क्या है?
यह समझना होगा कि जमानत कोई अधिकार नहीं, अदालत का विवेक है। जो लोग अदालत का फैसला पसंद आने पर संविधान की दुहाई देते हैं और नापसंद होने पर पत्थर उठा लेते हैं, वे असल में लोकतंत्र नहीं, भीड़तंत्र चाहते हैं।
आज मुद्दा किसी नेता का नहीं है। मुद्दा यह है कि देश संविधान से चलेगा या सड़क की हिंसा से? अदालत के आदेश मान्य होंगे या पत्थरबाज़ों की मर्जी चलेगी? अगर हर कानूनी कार्रवाई का जवाब दंगे से दिया जाएगा, तो फिर कानून, अदालत और लोकतंत्र—तीनों बेमानी हो जाएंगे।
साफ बात है, विरोध का हक है, हिंसा का नहीं। असहमति का रास्ता अदालत है, पत्थर नहीं। जो आज अदालत के आदेश पर हमला कर रहे हैं, वे दरअसल संविधान पर हमला कर रहे हैं, और संविधान पर हमला, किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
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