बंगलादेश में एक और अल्पसंख्यक हिन्दू की निर्मम हत्या ने इस बात को जोरदार तरीके से उजागर कर दिया है कि वहाँ धार्मिक सहिष्णुता केवल शब्दों में मौजूद है। यह कोई दुर्भाग्यपूर्ण संयोग नहीं, बल्कि लंबे समय से जारी भय और लापरवाही का नतीजा है।हिन्दू समुदाय, जो बंगलादेश की सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता का अहम हिस्सा है, बार-बार हिंसा और उत्पीड़न का शिकार बन रहा है। प्रशासन की निष्क्रियता और कानूनी कार्रवाई में धीमी गति ने अपराधियों को निर्भीक बना दिया है। जब न्याय का डर ही मिट जाए, तो समाज में भय और अविश्वास का माहौल फैलना स्वाभाविक है।यह घटनाक्रम सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लिए खतरा नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। लोकतंत्र और मानवाधिकारों का मतलब सिर्फ चुनाव और संविधान तक सीमित नहीं है; यह हर नागरिक को सुरक्षा और सम्मान देने का वादा है। बंगलादेश के लिए यह समय की मांग है कि वह अपने बहुल समाज के प्रति जिम्मेदारी दिखाए। यदि इस तरह की घटनाओं पर तत्काल और कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो न केवल निर्दोषों की जान खतरे में रहेगी, बल्कि देश की सामाजिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय छवि भी प्रभावित होगी।बंगलादेश की सत्ता को अब केवल भाषणों और दलीलों में नहीं, बल्कि वास्तविक सुरक्षा उपायों में सक्रिय होना होगा। अल्पसंख्यक समुदाय पर लगातार हो रही हिंसा को नजरअंदाज करना किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं है।
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