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चंद लोगों के हाथ की कठपुतली बनी है बिहार की राजनीति जो हमारे देश के लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहे है।

बिहार, जो कभी अपनी राजनीतिक चेतना, वैचारिक नेतृत्व और सामाजिक आंदोलन के लिए जाना जाता था, आज कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गया है। कभी लोकतंत्र की प्रयोगशाला कहा जाने वाला यह राज्य अब व्यक्तिवाद और जातिवाद की जकड़ में ऐसा उलझा है कि जनसरोकार पीछे छूट गया हैं और सत्ता की डोर कुछ नेताओं की मुठ्ठी में सिमट गई है।
लोकतंत्र का पतन और सत्ता का केंद्रीकरण
लोकतंत्र की मूल भावना यह है कि सत्ता जनता के हाथ में हो, लेकिन बिहार में वर्षों से यही लोकतंत्र कुछ परिवारों और दलों के शीर्ष नेताओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। पार्टियों के भीतर लोकतांत्रिक परंपराएं खत्म हो चुकी हैं। उम्मीदवारों का चयन, पदों का वितरण और नीतियों का निर्धारण सब कुछ “ऊपर” से तय होता है। जनता की राय, कार्यकर्ताओं की मेहनत और क्षेत्रीय जरूरतें अब केवल चुनावी भाषणों का हिस्सा रह गई हैं।
जातिवाद की जंजीरें और विकास की रुकावटें
बिहार की राजनीति में जातिवाद वह पुराना हथियार है जिससे हर बार जनता को बांटा गया। हर चुनाव से पहले जातीय समीकरणों की गणना होती है—न कि विकास योजनाओं या रोजगार के अवसरों की चर्चा। नतीजा यह है कि राजनीति अब “सेवा” नहीं बल्कि “समीकरण” बन गई है। जो नेता इन समीकरणों को साध लेता है, वही सत्ता में टिकता है, भले ही राज्य की जनता बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा की बदहाली से जूझती रहे।
जनता की भूमिका: वोट बैंक से आगे बढ़ने की जरूरत
दुख की बात यह है कि जनता भी इन “कठपुतली नेताओं” के खेल का हिस्सा बन गई है। चुनाव के समय मुफ्त राशन, जातीय अपील या किसी एक चेहरे की “छवि” पर वोट देना, फिर पांच साल बाद वही निराशा — यह चक्र अब तोड़ना होगा। जब तक जनता अपनी सोच को जाति और व्यक्ति की सीमाओं से ऊपर उठाकर विकास और सुशासन को आधार नहीं बनाएगी, तब तक बिहार की राजनीति कुछ चेहरों के इशारे पर नाचती रहेगी।
आवश्यक है नई राजनीतिक चेतना
बिहार को फिर से उसी वैचारिक ऊँचाई पर लाना होगा, जहाँ जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने “संपूर्ण क्रांति” का सपना देखा था। अब वक्त है कि नई पीढ़ी राजनीति में भागीदारी करे — न कि कठपुतली बने, बल्कि दिशा दिखाने वाली शक्ति बने। दलों में लोकतंत्र की बहाली, पारदर्शिता, और जनता आधारित नीति निर्माण की पहल ही बिहार की राजनीति को इन चंद लोगों की पकड़ से मुक्त करा सकती है।
बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा संकट यह है कि यहाँ “नेतृत्व” नहीं, “नेता” हैं; “विचारधारा” नहीं, “वोट-बैंक” है। राजनीतिक दल जनता को बांटकर सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं, और जनता हर बार यह सोचकर ठगी जाती है कि शायद इस बार कुछ बदलेगा। मगर असलियत यह है कि सत्ता की डोर उन्हीं पुराने हाथों में रहती है जो वर्षों से राजनीति को अपनी कठपुतली बनाकर नचाते आए हैं।राजनीति का यह चरित्र अब इतना जटिल हो चुका है कि जनता की आवाज़ भी धीरे-धीरे मौन होती जा रही है। पंचायत से लेकर विधानसभा तक, हर स्तर पर विचार नहीं, बल्कि व्यक्ति-पूजा का बोलबाला है। लोकतंत्र में जनता मालिक होनी चाहिए, मगर बिहार में जनता को केवल चुनावी मौसम में “गणना की इकाई” भर बना दिया गया है।
बिहार की राजनीति को यदि वास्तव में सुधारना है, तो जनता को जागरूक होना होगा। उसे यह समझना होगा कि विकास सिर्फ चुनावी घोषणाओं से नहीं, बल्कि उसके अपने निर्णय से संभव है। जाति, धर्म और क्षेत्रीय भावनाओं से ऊपर उठकर अगर जनता सही नेतृत्व को चुने, तो वही कठपुतली की डोर जनता के हाथों में लौट सकती है।
अंततः, सवाल यह नहीं है कि बिहार की राजनीति किसके हाथ में है, बल्कि सवाल यह है कि जनता अब भी क्यों मौन है?
जब तक जनता अपनी शक्ति को नहीं पहचानेगी, तब तक बिहार की राजनीति कुछ चंद लोगों की कठपुतली बनी रहेगी — और लोकतंत्र सिर्फ एक दिखावा मात्र रह जाएगा।

चंद्रकांत सी पूजारी
(गुजरात)

Karan Pandey

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