नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर गंभीर उथल-पुथल से गुजर रही है। ढाका के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को “मानवता के खिलाफ अपराध” के आरोप में दी गई फांसी की सजा ने देश में नई अस्थिरता को जन्म दे दिया है। हसीना की अनुपस्थिति में चलाए गए इस मुकदमे ने न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आलोचक इसे “राजनीतिक प्रतिशोध” बताते हुए अदालत की विश्वसनीयता पर भी निष्पक्षता की कमी का आरोप लगा रहे हैं।
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शेख हसीना, जो बांग्लादेश की सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली नेता रही हैं, देश में व्यापक जनाधार रखती हैं। ऐसे में उनकी सजा के बाद बांग्लादेश में हिंसा और तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। फैसले से पहले ही देश में कई स्थानों पर विस्फोट, हिंसा और पुलिस की खुली फायरिंग की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। प्रशासन ने हालात काबू में रखने के लिए ‘देखते ही गोली मारने’ के आदेश तक जारी किए हैं।
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इस बीच, मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार जनता के विश्वास संकट से जूझ रही है। विपक्ष से टकराव, कानून-व्यवस्था की विफलता और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते संघर्ष ने उसकी विश्वसनीयता को और कमजोर किया है। ऐसे माहौल में शेख हसीना को फांसी की सजा को कई विशेषज्ञ राजनीतिक छवि सुधारने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
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सबसे कठिन स्थिति भारत के सामने है, क्योंकि शेख हसीना फिलहाल भारत में रह रही हैं। ढाका की अंतरिम सरकार उनकी वापसी की मांग कर चुकी है। यदि भारत उन्हें सौंपता है तो यह राजनीतिक प्रतिशोध को वैधता देने जैसा होगा। वहीं यदि भारत उन्हें शरण देता है तो द्विपक्षीय संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।
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स्पष्ट है कि यह फैसला केवल न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की राजनीतिक स्थिरता और सुरक्षा समीकरण का बड़ा मुद्दा बन चुका है।
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