ज्ञान समान पवित्र नहीं कुछ इस
नश्वर संसार में कुछ भी होता है,
नि:संदेह ज्ञान और कर्मयोग के
द्वारा ही अंतःकरण शुद्ध होता है।
कर्मयोग के द्वारा तो ज्ञान मनुष्य
अपने आप आत्मा में पा लेता है,
वैदिक ज्ञान की समझ नहीं, इस
लिये तो पाखण्ड हमें घेर लेता है।
आयुर्वेद हमारा विकसित पर हम
पाश्चात्य चिकित्सा के क़ायल हैं,
आयुर्वेद विद्या का पूजन, प्रकृति का
ही पूजन, हम सत्कार में माहिर हैं।
धर्म, अर्थ, काम से मोक्ष प्राप्तकर
आयुर्वेद हमें स्वास्थ्य दीर्घायु देता है,
सारा शल्य तन्त्र आयुर्वेद आधारित,
आज चिकित्सक सर्जन कहलाता है।
पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख
घर हो लक्ष्मी की माया वेदों ने माना,
आदित्य स्वदेशी अपनाओ प्राणायाम
और योग जिसे ऋषियों वेदों ने माना।
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