मित्रता कभी मिलने को तरसे,
कभी साथ रहने को भी तरसे,
इससे अच्छी मित्रता क्या होगी,
बिना कभी मिले ही मित्रता रहे।
रिश्तों में चाहना, मिलना, देखना,
अच्छा लगना बहुत सरल होता है,
पर रिश्तों का रहना अक्सर एक
दूसरे संग निभाने पर निर्भर होता है।
अपनी आवश्यकतानुसार सम्बंध
निभाना हमारी सामान्य प्रवृत्ति है,
आवश्यकता के बिना ही दूसरों का
ख़याल रखना अति उत्तम प्रवृत्ति है।
खुद की ख़ुशियों की ख़ातिर जीवन
में किसी और से उम्मीदें क्यों करना,
मुसीबतों से खुद ही हमको लड़ना है,
अपनी ख़ुशियों का शिल्पी बनना है।
ख़ुश रहना खुद का तो अपने
खुद के ऊपर ही निर्भर करता है,
दूसरों को ख़ुशी देख कर भी तो,
दिल ख़ुश रहने का मन करता है।
जीवन में ख़ुश रहने का राज बस
यही एक है, जो कुछ भी सामने
आता है उससे ख़ुश रहना सीखें,
दिल से स्वीकारने को तैयार रहें ।
ख़ुश रहने पर ख़याल उसका आता है
जिससे भी दिल से रिश्ता होता है,
आदित्य हर अपना हो जाये जीवन
में ऐसा प्रश्न ही नही पैदा होता है।
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