श्री हरि की विपुल सौख्य-सम्पदा का अधिकारी अकिञ्चन भक्त

सिकन्दरपुर/बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। धरती तो बहुत बड़ी है किन्तु, जनपद के इस ग्राम में ही राजसूय महा यज्ञ का आयोजन क्यों हुआ? यह तो कहीं और भी हो सकता था। निश्चय ही आपका परम सौभाग्य है कि श्री मौनी जी की कृपा से यह आपको शुभ अवसर मिला। मनसा वाचा कर्मणा आप इतना प्रयास करें कि यह निर्विघ्न सफल हो ताकि महाराज श्री यह न कहें कि मेरे न रहने पर मेरा साथ नहीं दिया गया, एतदर्थ व्यासपीठ से मैं भी आशीवर्वाद दे रहा हैं। गोरखनाथ, गोरखपुर से पधार स्वामी रामदास ने ये बातें कही बीते दिन अक्रूर का व्रजगमन, गोपी-उध्दव सम्बाद की चूची के बाद वक्ता ने आज कहा कि कन्स-वध से रुष्ट उसकी दो पत्नियाँ अस्ति वप्राप्ति स्वपिता जरासन्ध से घटना की जानकारी दीं। जरासन्ध सत्रह बार मधुरा पर धावा बोला किन्तु हर बार परास्त हुआ। अठारहवीं बार के हमले में कृष्ण ससमाज द्वारिका चले गये अतः रणछोड़ कहे गये। उन्होंने मुचुकुन्द के माध्यम से कालयवन को मरवाया। १४ वर्ष मधुरा में रहने के बाद २५ वर्ष की आयु में द्वारिका गये ।. वहाँ रहते हुए रुक्मिणी, जामवन्ती, सत्या, मित्रवृन्दा इत्यादि आठ कन्याओं से बारी-बारी विवाह किया किन्तु १६१०० कन्याओं से एक दिन एक साथ विवाह किये। जिसके लिए सारे दरवाजे बन्द हो जाते हैं तो प्रभुका दरवाजा खुला होता है। विपत्ति की मारी इन हजारों कन्याओं पर कृष्ण ने कृपा की। क्क्ता ने एक सन्त के माध्यम से बताया कि कोई कितना भी निर्धन हो किन्तु कन्या की ससुराल का एक गिलास पानी भी नहीं पीया जाता बल्कि भेटे में कुछ न कुछ दिया ही जाता है। स्वामी जी ने पुतागे कहा कि अकिञ्चन भक्त अपनी कमाई पर भरोसा करते हैं, परधन पर नहीं। मार्ग में पड़े स्वर्ण को एक भक्त मिट्टी से टकने लगा कि कहीं उसकी पत्नी लोभवशउठान ले। जब पत्नी ने यह करते देखा तो बोला-अरे इस मिट्टी से मिट्टी को क्यों ढक रहे हो? जंगल में सूखी लकड़ि‌याँ भी न मिलीं तो उन्होंने स्वर्ण-दर्शन को अपशकुन जाना । भोजन शब्द में मात्रा लगी है, भजन में नहीं, अतः भोजन कम मात्रा में तथा भजन अधिकाधिक मात्रा में करना चाहिए। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का निमन्त्रण पाकर कृष्ण उनके यहाँ इन्द्रप्रस्थ पहुंचा वहाँ अग्रपूजा के समय शिशुपाल ने कृष्ण को शताधिक गालियाँ दी, कृष्ण ने चक्रायुध से उसका शीश काट दिया। ऐसे ही भीमार्जुन के साथ जाकर जरासन्ध को युक्ति से भीम द्वारा भरवाकर जेल में निरुद्ध ह‌जारो कैदियों को किया। प्रभु-प्रदत्त अल्प संसाधनों से सन्तुष्ट अकिञ्चन सुदामाजी स्वपत्नी सुशीला द्वारा उत्प्रेरित हो भेंट में एक पाव चावल या चिउड़‌ा लेकर कृष्ण के पास द्वारिका गये। कृष्ण उन्हें पाकर फूलेन समाये | पलकों के पाँवड़े बिछाये कृष्ण ने निष्काम भक्त और सखा सुदामा को विपुल सौख्य-सम्पदा प्रदान कर दो

Karan Pandey

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