अभय मुद्रा और बिहार का रण: राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा से सियासत की नई पटकथा

(राजकुमार मणि)

“मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया” – मजरूह सुल्तानपुरी की ये पंक्तियाँ मौजूदा भारतीय राजनीति की सियासी यात्रा संस्कृति पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं।

महात्मा गांधी की पदयात्राओं से लेकर विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण और अब राहुल गांधी तक—भारतीय राजनीति में यात्राओं का हमेशा एक ऐतिहासिक महत्व रहा है। गांधी जी ने भारतीय मानस से अंग्रेजों का भय मिटाकर राजनीति को अभय की भावना दी। यही अभय—निडर रहने की प्रेरणा—आज राहुल गांधी भी अपने राजनीतिक भाषणों और यात्राओं में दोहरा रहे हैं। संसद में उन्होंने शिव की अभय मुद्रा से लेकर इस्लाम की दुआ की मुद्रा तक का हवाला देकर इसे निडर लोकतंत्र का प्रतीक बताया।

यात्राओं की परंपरा और राहुल का सफर

राहुल गांधी ने राजनीति के शुरुआती दिनों से ही यात्राओं का सहारा लिया।

भट्टा-पारसौल (पश्चिम यूपी, 2011) – भूमि अधिग्रहण के खिलाफ पैदल यात्रा, जिसने मायावती सरकार को चुनौती दी।

किसान यात्रा (देवरिया से दिल्ली, 2016) – किसानों की बदहाली पर केंद्रित, 2,500 किलोमीटर का सफर और नारा दिया “कर्जा माफ, बिजली बिल हाफ।”

केदारनाथ यात्रा (2015) – आपदा के बाद पुनर्निर्माण की तस्वीर दिखाने और धार्मिक-आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ाव जताने का प्रयास।

भारत जोड़ो यात्रा (2022–23) – राहुल गांधी की सबसे चर्चित यात्रा, जिसमें वे पैदल हजारों किलोमीटर चले और भाजपा की राजनीति के खिलाफ वैचारिक लड़ाई छेड़ी।

अब उनकी “वोटर अधिकार यात्रा” सामने है, जो कई मायनों में अलग है।

बिहार की पृष्ठभूमि और महागठबंधन की चुनौती

बिहार की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों पर टिकी है। 40 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य ने 2024 के आम चुनाव में भाजपा को निर्णायक बढ़त दी, जबकि यूपी, महाराष्ट्र और बंगाल में भाजपा की सीटें गिरीं। ऐसे में कांग्रेस और महागठबंधन के लिए बिहार अगला बड़ा रणक्षेत्र है।

राहुल गांधी की इस यात्रा का मकसद—

बहुजन समाज को साधना

जाति जनगणना और आरक्षण की सीमा हटाने की मांग को केंद्र में रखना

दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज को एक साझा राजनीतिक छतरी के नीचे लाना

नीतीश कुमार की जदयू और चिराग पासवान की लोजपा के वोट बैंक में सेंध लगाना

यहां राहुल गांधी मुकेश सहनी की वीआईपी और दीपंकर भट्टाचार्य की सीपीआईएमएल जैसी क्षेत्रीय दलों की लाइन के करीब दिखाई दे रहे हैं।

भारत जोड़ो यात्रा से अंतर

भारत जोड़ो यात्रा पूरी तरह राहुल गांधी के इर्द-गिर्द केंद्रित थी। वे पैदल लोगों से जुड़े और छवि में बदलाव लाने में सफल रहे।
वहीं वोटर अधिकार यात्रा एक साझा मोर्चे की तस्वीर पेश करती है। इसमें राहुल अकेले नहीं, बल्कि तेजस्वी यादव जैसे सहयोगी बराबरी से शामिल हैं। यह एक गठबंधन का सामूहिक संदेश है, न कि केवल कांग्रेस का।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश और राजनीतिक संदर्भ

यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है। बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और अचानक एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने से मतदाता अधिकारों पर संदेह गहरा गया। राहुल गांधी इस मौके को एक अखिल भारतीय मुद्दे में बदल रहे हैं—वोट चोरी को लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती बताकर।
महात्मा गांधी ने जिस “अभय” की बात कर भारतीय राजनीति को नई दिशा दी थी, राहुल गांधी उसी धारा को आधुनिक राजनीतिक संदर्भ में जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या उनकी यह यात्रा बिहार में कांग्रेस और महागठबंधन को जमीन पर मजबूती दे पाएगी? क्या जाति जनगणना और वोटर अधिकार जैसे मुद्दे भाजपा की चुनावी बढ़त को चुनौती देंगे?

इतिहास गवाह है कि भारत की राजनीति में यात्राएं सिर्फ पैरों की थकान नहीं होतीं, बल्कि वे जनमानस को झकझोरने वाली धार बन जाती हैं। अब देखना यह होगा कि राहुल गांधी की यह यात्रा अभय मुद्रा की तरह जनता को निडर लोकतंत्र की ओर ले जा पाएगी या नहीं।

Editor CP pandey

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