श्री राम कथा का सातवां विश्राम: भक्ति, भाव और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत महायज्ञ
सिकंदरपुर/बलिया (राष्ट्र की परम्परा)सिकंदरपुर क्षेत्र के लीलकर गांव में ब्रह्मलीन संत परमहंस श्री स्वामी गंगाधर शास्त्री जी महाराज की पावन तपोस्थली पर आयोजित श्री सीताराम महायज्ञ का आठवां दिन और श्री राम कथा का सातवां विश्राम दिवस भक्तिभाव, अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना का अनुपम संगम बना। नौ दिवसीय इस महायज्ञ की पूर्णाहुति 13 फरवरी को वैदिक विधि-विधान से संपन्न होगी।
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राम राज्याभिषेक प्रसंग से भावपूर्ण समापन
कथा वाचिका आरती पाठक ने राम राज्याभिषेक के मार्मिक प्रसंग के साथ कथा को विराम दिया। उन्होंने राजा दशरथ के जीवन-संदेश को रेखांकित करते हुए बताया कि शुभ कार्यों को टालना जीवन की बड़ी भूल हो सकती है। “समय का सदुपयोग ही सच्चा धर्म है”—इस संदेश ने श्रोताओं को गहराई से स्पर्श किया।
कैकेयी प्रसंग और त्याग का मर्म
कथा में कैकेयी प्रसंग का भावनात्मक चित्रण करते हुए सुश्री पाठक ने त्याग और नियति के रहस्य को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि लोक-निंदा सहकर भी यदि किसी का जीवन-उद्देश्य पूर्ण होता है, तो वह त्याग महान होता है। इसके बाद राम-केवट संवाद, शूर्पणखा प्रसंग, खर-दूषण वध, मारीच वध, शबरी की नवधा भक्ति, बालि वध, सुग्रीव राज्याभिषेक, मेघनाद व कुंभकरण वध तथा रावण संहार से होते हुए श्रीराम राज्याभिषेक तक की सजीव झांकियां भजनों के साथ प्रस्तुत की गईं। वातावरण “जय श्रीराम” के जयघोष से गूंज उठा।
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जनप्रतिनिधियों व संतों की गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम में पूर्व विधायक भगवान पाठक, प्रधान संघ अध्यक्ष जितेंद्र यादव, प्रवक्ता दुर्गेश राय सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। आज के यजमान दुर्गेश राय रहे।
यज्ञाचार्य जय नारायण शास्त्री जी महाराज ने कथा वाचिका को अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। ब्रह्मचारी पीठाधीश्वर एवं महामंडलेश्वर कृष्ण दास जी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त हुआ। साथ ही अद्वैत शिव शक्ति परमधाम के पीठाधीश्वर शिवेंद्र ब्रह्मचारी, दामोदर दास महाराज, कन्हैया दास जी महाराज, बलिराम दास जी महाराज सहित अनेक संत-महंतों की उपस्थिति से आयोजन दिव्यता से भर उठा।
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अगले वर्ष हनुमान महायज्ञ की घोषणा
महायज्ञ के व्यवस्थापक पंकज राय ने घोषणा की कि अगले वर्ष श्री हनुमान महायज्ञ का भव्य आयोजन किया जाएगा, जिस पर श्रद्धालुओं ने हर्ष व्यक्त किया।कथा का मूल संदेश,समय की महत्ता समझना,शुभ कार्यों को टालने से बचना,त्याग, मर्यादा और धर्म का आचरण,रामराज्य की अवधारणा को जीवन में उतारना।
लीलकर की तपोभूमि पर भक्ति, अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना का यह संगम न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि सामाजिक एकता और नैतिक जागरण का संदेश भी देता है।
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