विश्व चक्रीय अर्थव्यवस्था मंच 2026: क्या प्लास्टिक और ई-कचरे का कबाड़ बनेगा नई अर्थव्यवस्था की ताकत?

फेंकने की संस्कृति पर ब्रेक, कचरे से कमाई और संसाधनों के पुनः उपयोग का वैश्विक बिग
आज दुनिया आर्थिक विकास, प्राकृतिक संसाधनों की कमी, बढ़ते कचरे, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और कच्चे माल की बढ़ती मांग जैसी अनेक चुनौतियों के बीच खड़ी है। ऐसे समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था को केवल उत्पादन-उपभोग-फेंकने वाली रैखिक व्यवस्था से निकालकर ऐसी व्यवस्था की ओर ले जाने की आवश्यकता बढ़ रही है, जिसमें वस्तुओं और सामग्रियों का मूल्य तथा उपयोग अधिकतम समय तक कायम रहे। इसी विचार को चक्रीय अर्थव्यवस्था यानी Circular Economy कहा जाता है।
भारत में इसका दर्शन पूरी तरह नया नहीं है। मरम्मत करना, पुरानी वस्तुओं का पुनः उपयोग, पुराने कपड़ों को दूसरे काम में लेना, कबाड़ से उपयोगी वस्तुएं बनाना और संसाधनों को व्यर्थ न जाने देना भारतीय सामाजिक व्यवहार का हिस्सा लंबे समय से रहा है। अब यही पारंपरिक सोच आधुनिक तकनीक, वित्त, उद्योग और नीतिगत ढांचे से जुड़कर वैश्विक आर्थिक मॉडल का हिस्सा बन रही है।
इसी संदर्भ में World Circular Economy Forum (WCEF) 2026 का आयोजन भारत में 15 से 18 सितंबर 2026 तक गुजरात के गांधीनगर स्थित महात्मा मंदिर में हो रहा है। यह दक्षिण एशिया में WCEF का पहला आयोजन है और इसे Finnish Innovation Fund Sitra तथा भारत के Central Pollution Control Board (CPCB) द्वारा अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ आयोजित किया जा रहा है।
जनता और समृद्धि के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था
WCEF 2026 की थीम “Circular economy: Transition for people and prosperity” यानी “जनता और समृद्धि के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर परिवर्तन” है। इसका केंद्र केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि रोजगार, व्यवसाय, निवेश, नवाचार, संसाधन दक्षता और आर्थिक लचीलेपन को एक साथ जोड़ना है। आयोजकों के अनुसार WCEF दुनिया भर के कारोबारी नेताओं, नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों को एक मंच पर लाकर चक्रीय समाधान आगे बढ़ाने का प्रयास करता है।
चक्रीय अर्थव्यवस्था का मूल मंत्र सरल है—बदलने से पहले मरम्मत, फेंकने से पहले पुनः उपयोग और नष्ट करने से पहले उपयोगी सामग्री की पुनर्प्राप्ति।
मोबाइल फोन खराब होने पर उसे तुरंत फेंकने के बजाय मरम्मत किया जा सकता है। वाहन के पुराने पुर्जों को दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है। पुराने भवनों की निर्माण सामग्री को पुनः इस्तेमाल किया जा सकता है। पुराने कपड़ों से नए उत्पाद बनाए जा सकते हैं। ई-कचरे से तांबा, सोना, एल्युमिनियम और अन्य मूल्यवान सामग्री वापस प्राप्त की जा सकती है। खाद्य एवं जैविक कचरे से कम्पोस्ट तथा बायोगैस बनाई जा सकती है।
इसलिए चक्रीय अर्थव्यवस्था केवल कचरा प्रबंधन नहीं है; यह उत्पादन और उपभोग की पूरी व्यवस्था को नए सिरे से डिजाइन करने की अवधारणा है।
कबाड़ से अरबों की अर्थव्यवस्था का रास्ता
प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, बैटरियां, पुराने कपड़े, टायर, निर्माण सामग्री और औद्योगिक अपशिष्ट को यदि सही तकनीक से संसाधित किया जाए तो वे अगले उत्पादन चक्र के कच्चे माल बन सकते हैं।
यही वह बिंदु है जहां कचरा आर्थिक संपदा में बदल सकता है। संग्रहण, छंटाई, मरम्मत, रिफर्बिशिंग, रीसाइक्लिंग, री-मैन्युफैक्चरिंग और सामग्री रिकवरी से नए व्यवसाय खड़े हो सकते हैं। WCEF की आधिकारिक सामग्री भी चक्रीय समाधानों को नए व्यवसाय, रोजगार और आर्थिक अवसरों से जोड़ती है।
वैश्विक स्तर पर संसाधनों के अप्रभावी उपयोग की समस्या बड़ी है। Sitra द्वारा उद्धृत हालिया अनुमानों के अनुसार वैश्विक अर्थव्यवस्था में हर वर्ष उत्पाद जीवन-चक्र और मूल्य शृंखलाओं में 25 ट्रिलियन डॉलर से अधिक संभावित मूल्य नष्ट हो जाता है, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था की चक्रीयता लगभग 7 प्रतिशत बताई गई है।
भारत के लिए आर्थिक अवसर
भारत जैसे विशाल उपभोक्ता बाजार और तेजी से बढ़ते विनिर्माण क्षेत्र वाले देश के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था का महत्व और बढ़ जाता है। लौह अयस्क, तांबा, एल्युमिनियम, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक धातुओं जैसे संसाधनों की मांग बढ़ने के साथ पुराने उत्पादों से सामग्री वापस अर्थव्यवस्था में लाने की क्षमता महत्वपूर्ण हो सकती है।
इससे एक ओर आयातित कच्चे माल पर निर्भरता कम करने की संभावना है, तो दूसरी ओर रिपेयर, रिफर्बिशिंग, रिसाइक्लिंग, री-मैन्युफैक्चरिंग और वेस्ट-कलेक्शन जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर विकसित हो सकते हैं।
भारत में Extended Producer Responsibility (EPR) जैसे तंत्र उत्पादकों को उनके उत्पादों के उपयोग के बाद की जिम्मेदारी से जोड़ने का प्रयास करते हैं। भविष्य में उत्पादों को शुरुआत से ही अधिक टिकाऊ, मरम्मत योग्य और पुनर्चक्रण योग्य बनाना चक्रीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण शर्त हो सकती है।
चक्रीय वित्त और निवेश की भूमिका
किसी भी तकनीक को प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंचाने के लिए पूंजी आवश्यक है। इसलिए चक्रीय अर्थव्यवस्था में Circular Finance की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
बैंक, निवेशक, विकास वित्त संस्थान और निजी कंपनियां ऐसे कारोबारों में निवेश कर सकते हैं जिनकी कमाई संसाधनों की बचत, पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण से जुड़ी हो। उदाहरण के लिए किसी स्टार्टअप के पास प्लास्टिक को उच्च गुणवत्ता वाले पुनर्चक्रित कच्चे माल में बदलने की तकनीक है, लेकिन उत्पादन बढ़ाने के लिए पूंजी नहीं है। ऐसे में वित्तीय सहायता उस तकनीक को व्यावसायिक स्तर तक पहुंचाने में मदद कर सकती है।
ई-कचरा और बैटरी: अगली बड़ी चुनौती
डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ ई-कचरा तेजी से महत्वपूर्ण मुद्दा बन रहा है। मोबाइल, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों में अनेक मूल्यवान धातुएं मौजूद होती हैं। यदि इनकी वैज्ञानिक तरीके से रिकवरी की जाए तो एक ओर प्रदूषण कम किया जा सकता है और दूसरी ओर महत्वपूर्ण संसाधनों को फिर अर्थव्यवस्था में लाया जा सकता है।
इसी प्रकार इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों के second-life applications और अंततः उनमें मौजूद मूल्यवान धातुओं की रिकवरी चक्रीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।
ऊर्जा, कृषि और निर्माण भी चक्रीय मॉडल के हिस्से
चक्रीय अर्थव्यवस्था का दायरा केवल प्लास्टिक या ई-कचरे तक सीमित नहीं है। सौर पैनलों के जीवन के बाद उनकी सामग्री का पुनर्प्रयोग, औद्योगिक जल का पुनः उपयोग, निर्माण सामग्री का पुनर्चक्रण, कृषि अवशेषों से जैव-ऊर्जा, खाद्य अपशिष्ट से उपयोगी उत्पाद और टिकाऊ फैशन इसके व्यापक उदाहरण हैं।
यदि फसल अवशेषों को जलाने के बजाय जैव-ऊर्जा, कम्पोस्ट या अन्य उपयोगी उत्पादों में बदला जाए तो प्रदूषण कम करने के साथ आर्थिक मूल्य भी बनाया जा सकता है।
वैश्विक सहयोग का नया मंच
चक्रीय अर्थव्यवस्था किसी एक देश के प्रयास से पूरी नहीं हो सकती। एक देश के पास तकनीक, दूसरे के पास निवेश, तीसरे के पास कच्चा माल और चौथे के पास प्रभावी नीति का अनुभव हो सकता है। इसलिए तकनीक, ज्ञान, वित्त और नीतिगत अनुभव का अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान जरूरी है।
WCEF 2017 से Sitra की पहल के रूप में विकसित हुआ और अब वैश्विक मंच बन चुका है। 2026 में भारत में इसका आयोजन दक्षिण एशिया में पहली बार हो रहा है।
अतः WCEF 2026 का व्यापक संदेश यह है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग पर आधारित नहीं रह सकती। संसाधनों का अधिकतम मूल्य बनाए रखना, उत्पादों का जीवन बढ़ाना, कचरे को संसाधन में बदलना, तकनीक को वित्त से जोड़ना और वैश्विक सहयोग को मजबूत करना आर्थिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
गांधीनगर में आयोजित यह मंच भारत के लिए केवल पर्यावरणीय चर्चा का अवसर नहीं, बल्कि संसाधन दक्षता, रोजगार, निवेश, नवाचार, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और टिकाऊ विकास को एक ही आर्थिक ढांचे में जोड़ने का अवसर है।
यदि मरम्मत, पुनः उपयोग, पुनर्निर्माण और पुनर्चक्रण उद्योग, बाजार और उपभोक्ता व्यवहार का सामान्य हिस्सा बनते हैं, तो आज का कचरा कल की अर्थव्यवस्था का कच्चा माल बन सकता है।
फेंकने की संस्कृति से बचत की संस्कृति, अपशिष्ट से संसाधन और रैखिक विकास से चक्रीय समृद्धि की ओर यही परिवर्तन चक्रीय अर्थव्यवस्था का मूल दर्शन है।
लेखक:
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया, महाराष्ट्र
विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि एवं संगीत माध्यम से जुड़े लेखक तथा सीए (एटीसी), एडवोकेट
